केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अरुण जेटली ने परम्परा के अनुसार आगामी बजट के संदर्भ में देश के अर्थजगत उद्योग व्यापार, कृषि के लोगों व संगठनों से वार्ता-विचार-विमर्श करना शुरू कर दिया है.

आमतौर पर इसमें कृषि की स्थिति, औद्योगिक उत्पादन, आयात-निर्यात- व्यापार और इन सबसे ऊपर देश के उपभोक्ता वर्ग की आम जरूरतों की वस्तुओं का मूल्य प्रधान होता है.

यह अब बिल्कुल खुली हुई स्थिति है कि भारतीय जनता पार्टी की मोदी सरकार जो यूपीए सरकार के दौर में आई महंगाई के विरुद्ध वोट मांगकर सत्ता में आई है- वह मूल्य वृद्धि कम करने में न सिर्फ पूर्ण असफल रही है बल्कि महंगाई यूपीए काल से कहीं ज्यादा हो गयी है. 200 रुपये के ऊपर नीचे दाल का भाव भारत में मूल्य वृद्धि का अब तक सबसे बड़ा रिकार्ड है. क्या यही मोदी सरकार के अच्छे दिन का रिकार्ड है. बजट पूर्व ही स्वच्छता की आड़ में सभी वस्तुओं पर सर्विस टैक्स लगा दिया और रेट भी बढ़ा दिया. नीति यह चल रही है कि सब्सिडी कम करते जाओ और सर्विस टैक्स बढ़ाते जाओ. हर बार बढ़ाते समय उसके साथ ‘गरीबों को शिक्षाÓ ‘भारत स्वच्छताÓ के लुभावने नाम-नारे जोड़ दो.

रेल यात्रा- यातायात के किराया-भाड़ा में यह माना ही जाता है कि उसमें रेल का संचालन खर्च और दी जाने वाली सुविधाओं की लागत मय मुनाफा के शामिल है. अब रेलों में हर सुविधा व नाम पर आइटम वार चार्ज, सरचार्ज व सर्विस टैक्स लगाना शुरु कर दिया है.

केन्द्र में अभी रेल व जनरल बजट आना है और उससे पहले ही एक्जीक्यूटिव आर्डर से तमाम टैक्स व रेट बढ़ा डाले. अब नये बजट में क्या नये टैक्सों के नाम पर और टैक्स लगेगा.

यह कहा जा रहा है कि बैंकों का समय पर कर्जा वसूल न होने से 4000 अरब रुपयों का नाम परफार्मिंग एसेट (एन.पी.ए.) हो गया, इसके लिये उद्योग-व्यापार जगत को ‘डिफाल्टरÓ मानना उन पर एक और ज्यादती है.

एक लम्बे अर्से से दुनिया में मंदी का दौर है. देश के अन्दर बैंक दरें ऊंची होने से पून्जी अभाव है. जो कुछ निवेश होता वह लोगों ने सोना में लगा दिया, महंगाई से लोगों की खरीदने की शक्ति कम हो गयी. औद्योगिक उत्पादन व उसकी खरीद गिर गयी. कर्जा न चुका पाना उनकी बेईमानी नहीं मजबूरी हो गयी. विदेशी निवेश उम्मीद से कम रहा रेलवे को सबसे ज्यादा जरूरत है वहां सबसे कम रहा.
नये बजट में ऐसे प्रोत्साहन व साधन उपलब्ध होने चाहिए कि कृषि-उद्योग-व्यापार बढ़े और मूल्यों में कमी से लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारें. देश में महंगाई राज्यों के छठवें और केन्द्र में सातवें वेतन आयोग आने से पहले ही उन्हें बेअसर कर चुकी है.

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