संवैधानिक व्यवस्था यह है कि संसद कानून बना देती है, प्रस्ताव पास कर देती है, अदालतें फैसले देती है लेकिन इन दोनों संवैधानिक निकायों के निर्णयों का और उनकी व्यवस्थाओं की पूरी व्यवस्था करना सरकार (एक्जीक्यूटिव) का काम है. न्यायपालिका खुद होकर न तो अदालतों के ….. बनवा सकती है और न ही जजों के पद निर्मित कर उन पर भर्ती कर सकती है. इन संस्थाओं को जो भी जरूरत महसूस होती है वह उसे सरकार को ही भेज देते है. उनके लिये फंड जुटाना, बजट प्रावधान करना आदि सभी काम सरकार के करने के लिये होते है. इन दोनों संवैधानिक संस्थाओं को व्यवस्था की कमी के लिये किसी भी तरह किसी भी ….. दोषी नहीं करार दिया जा सकता.

इन अदालतों में मामले दशकों तक लंबित रहते है. मुकदमे बढ़ते जा रहे है. यह स्थिति भी स्वतंत्र भारत में पहले दिन से चली आ रही है. सिर्फ एक बड़ा परिवर्तन यह हुआ कि संविधान की व्यवस्था के अनुरूप जुडीशरी और एक्जीक्यूटिव का एक-दूसरे से पृथक (सेपरेशन) कर दिया गया. इससे पहले सरकारी अफसर भी मुकदमे सुनने का काम करते थे और पृथक जज भी होते थे. जैसे कभी पोस्ट आफिस और तार घर संयुक्त (कम्बाइन्ड) हुआ करते थे. अब दोनों पृथक कर दिये गये है. इससे अदालतों की गरिमा व स्वाधीनता मेें उनके प्रति आदर व विश्वास बढ़ा है.

आज के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी व भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री टी.एस. ठाकुर जजों व अदालतों की कमी के लिये जिम्मेदार नहीं है. यह तो लगभग स्थाई व्यवस्था के रूप में हमेशा से चला आ रहा है. दिल्ली में जो मुख्य न्यायाधीशों व मुख्यमंत्रियों का जो संयुक्त सम्मेलन हो रहा है उसने श्री ठाकुर न्यायपालिका का पक्ष व स्थिति को जिस रूप में सामने रखा उससे तो पूरा दोषारोपण अभी तक की सभी सरकारों पर ही जाता है. उन्होंने बताया कि 1987 में ही सरकार द्वारा गठित लॉ कमीशन ने जजों की संख्या को प्रति दस लाख लोगों पर दस न्यायाधीशों को बढ़ाकर 50 करने की सिफारिश की थी, लेकिन उस पर सरकार ने कुछ नहीं किया. अमेरिका में एक जज साल में औसतन 81 मामले निपटाता है वहीं भारतीय 2600 मुकदमे निपटा रहे हैं.

इस हिसाब से तो भारत के जज बहुत ज्यादा काम कर रहे हैं. इसी संदर्भ में श्री ठाकुर ने देश में मौजूदा जजों की संख्या को 21 हजार से बढ़ाकर 40 हजार करने का सुझाव दिया. सरकार को ही इस सुझाव को लागू करना है. न्यायपालिका को खुद ऐसा करने का अधिकार नहीं है.

संसद में किसी स्पीकर ने ‘जीरो आवर’ की अनूठी और बहुत लाभदायक परम्परा डाली है. उसी तरह भारत के सुप्रीम कोर्ट में किसी मुख्य न्यायाधीश ने ‘जनहित याचिका’ की जनहित में ऐसी अनूठी प्रणाली शुरु की है कि वह अपने आप एक त्वरित न्याय प्रणाली बन गयी है. जैसे अपने प्रभावी स्वरूप के कारण राजनैतिक व प्रशासनिक जीवन में सी.बी.आई. की अहमियत ज्यूडिशल कमीशन से ज्यादा हो गयी. उसी तरह जनता को सबसे ज्यादा न्यायिक सुख जनहित याचिकाओं से मिल रहा है. अदालतों ने इसका दुरूपयोग न हो इसका भी ख्याल रखा है. भारत की न्यायपालिका ने लोक अदालत प्रणाली से हजारों मुकदमों को त्वरित गति और आपसी सद्भाव से निपटाया है. अदालतों व जजों की भारी कमियों के होते हुए भी जजों ने क्षमता से अधिक काम किया है और जनहित व लोकहित में नई व्यवस्थाएं भी स्थापित की हैं.

भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री ठाकुर इस बात से बड़े दु:खी व व्यथित थे कि इतनी कमी के बाद भी यह तो लगातार कहा जा रहा है कि मुकदमों का अम्बार लग रहा है. अदालतें निपटारा नहीं कर रहीं. लेकिन इसका जरा भी उल्लेख कोई नहीं कर रहा कि जजों ने इसके बावजूद कितने सारे मुकदमे निपटा दिये हैं. श्री नरेन्द्र मोदी ने इस दिशा में जो पहल व सक्रियता दिखाई है उसे उन्हें कार्य रूप में तुरन्त करके दिखाना चाहिए.

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