स्कूली बसों के संचालकों ने अपनी एक दिन की सांकेतिक हड़ताल वापस ले ली है. लेकिन सरकार का यह दायित्व बराबर बना हुआ है कि अब वह सुनिश्चित करे कि स्कूली बसों, मेजिक व आटो के बारे में बच्चों की सुरक्षा पूरी तरह स्थाई तौर पर बनी रहे और सुप्रीम कोर्ट के काफी पहले दिये जा चुके दिशा-निर्देश (गाइड लाइन्स) का पालन हो.

इंदौर में स्कूली बस दुर्घटना व कई बच्चों की मौत के समय यह बात साफ सामने आयी कि इस मामले में सरकार ही उदासीन रही. स्कूली बसों द्वारा न तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के और न ही राज्य सरकार के निर्देशों के अनुसार काम हो रहे थे. बसों में स्पीड व गवर्नर कैमरे, महिला अटैंडेंट कुछ भी नहीं थी.

सरकार ने केवल आदेश निकाल कर उसकी खानापूरी कर ली. दुर्घटना हो गयी तो इंदौर के आर.टी.ओ. को हटा दिया. जबकि सरकारी निर्देशों की उपेक्षा पूरे राज्य में इसी तरह हो रही थी. राजधानी भोपाल में भी स्कूल बसें निर्देशों के अनुसार नहीं थीं. अब सरकार को इस मामले में हमेशा सचेत रहकर निरंतर निगरानी करनी होगी.

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