बाघों के शिकार पर अंकुश लगाने के लिये केन्द्र सरकार ने निर्णय किया है कि ड्रोन यानों से इनके अभ्यारणों की निगरानी की जायेगी. इनके शिकार की बढ़ती संख्या पर चिन्तित होकर सरकार ने बाघों के बारे में ई- (इलेक्ट्रॉनिक) सर्वीलियेन्स का निर्णय लिया है.

हाल ही में गत वर्ष 2014 में देश भर में बाघ गणना का काम किया गया था और भारत में 2226 बाघ पाये गये. सर्वाधिक कर्नाटक में 406 थे और इससे पूर्व इनकी संख्या 2010 में 300 और 2006 में घटकर 290 थी. दूसरे नम्बर पर उत्तराखंड है, जहां विश्व प्रसिद्ध जिम कार्बेट नेशन पार्क है. इस राज्य में 340 बाघ थे जो 2010 में 227 और 2006 में 178 थे.

देश में मध्यप्रदेश तीसरे स्थान पर जहां 2014 में 308 पाये गये. यहां 2010 में 257 और 2006 में 300 बाघ थे. संसार में बाघ की एक अत्यन्त सुन्दर और बलिष्ठï प्रजाति ‘रायल बंगाल टाइगर’ पश्चिम बंगाल के गंगा तटीय और समुद्री मुहाने सुन्दरवन में पाया जाता है. वहां इनकी संख्या 2014 में बढ़कर 76 हो गयी है जो 2010 में 70 थे. सन् 2014 की बाघ गणना (टाईगर सेन्सस) में बाघों की संख्या बढ़कर 2226 आयी है जो 2010 में 1706 और 2006 में 1411 थे.

लेकिन बाघों का शिकार अन्तरराष्ट्रीय तस्करी के लिये किया जाता है. एक बड़ा ही हृदय विदारक कांड आंध्र के बाघ अभ्यारण्य में हुआ. जहां बाघों को मांस देने वाले कर्मचारी ने तस्करों से सौदेबाजी कर एक मादा बाघ का सिर काट कर उन्हें बेचा था.

वहीं एक बड़ी हास्यास्पद स्थिति भी सामने आई है कि बाघों की खाल में कुत्तों की खालों की मिलावट की जा रही है. बड़े आकार के कुत्तों का शिकार कर उनकी खालों को इस तरह पेंट किया जाता है जैसे वह बाघ की खाल हो. इसका एक अच्छा असर यह तो हुआ कि खाल खरीदने वाले बिचक गये हैं और इसके व्यापार व तस्करी में कमी आई है. मिलावट भी सब हदें पार कर सभी जगह पहुंच ही जाती है.

देश में उच्च स्तर के 47 टाइगर रिजर्व (अभ्यारण्य) हैं जिनमें 68,700 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र आता है. इनमें मध्यप्रदेश का नागार्जुन सागर श्रीसामलयम…. का सबसे बड़ा है लेकिन पर्यटन की दृष्टिï से अत्याधिक दर्शनीय व सुविधाओं के लिए मध्यप्रदेश में मंडला जिले का कान्हा किसली टाईगर सेग्चुरी, बांधवगढ़ और अब पन्ना जिले का बाघ अभ्यारण्य भी राष्टï्रीय स्तर की ख्याति रखता है. जहां बंगाल को यह श्रेय जाता है कि उसने संसार को सर्वश्रेष्ठï प्रजाति ‘रायल बंगाल टाईगर’ दी है. गुजरात को यह श्रेय जाता है कि भारत में केवल उसी राज्य में गिर क्षेत्र में बब्बर शेर अभी मौजूद हैं. इसके अलावा वे अफ्रीका में पाये जाते हैं. वहीं मध्यप्रदेश को यह विश्व स्तरीय गौरव प्राप्त है कि उसने सारे संसार को ‘सफेद शेर’ दिया है. वर्तमान में मौजूद यह सफेद प्रजाति का पितामह ‘मोहन’ रीवा क्षेत्र के बांधवगढ़ के जंगलों में पाया गया था और रीवा के गोविंदगढ़ में उसे आवास दिया और उसने अपनी संंतति को सारे जहां को दिया.

अब मध्यप्रदेश में गिर के शेर बब्बर को लाकर मुरैना के कूनो अभ्यारण्य में नया आवास देकर उसकी प्रजाति को ‘सफेद शेरÓ की तरह सभी जगह फैलाया, बसाया जा रहा है. पता नहीं क्यों किस प्रांतीय संकीर्णता में उसे गुजरात तक सीमित रखना चाहते हैं.

अब उन्होंने ‘गिर’ शेर को उनके औद्योगिक अभियान ‘मेक इन इंडियाÓ का लोगो बना दिया है. हो सकता है अब श्री मोदी गिर को ‘स्प्रेड इन इंडियाÓ भारत में फैलाने के लिए तैयार हो जाएं.

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