अनुमानों व आंकलनों में तो यह कहा जाता है कि देश में हर साल 64,000 करोड़ रुपयों की चोरी हो रही है. वास्तविकता में यह स्थिति होगी कि 4000 करोड़ रुपयों की तो चोरी हो रही है और 60,000 करोड़ रुपयों का भ्रष्टïाचार व काली कमाई हो रही है. इसके दुष्परिणाम उस ‘आम आदमीÓ को बढ़ते जा रहे बिजली के दरों से हो रहा है जो ईमानदारी से मीटर के हिसाब से बिल भुगतान करता जा रहा है.

बिजली की चोरी ज्यादातर झुग्गी बस्तियों व मध्यम वर्ग के कुछ घरों में होती है. लेकिन बड़ी चोरी व भ्रष्टïाचार वे लोग कर रहे हैं जो ब्लक कन्ज्यूमर्स, बड़े उद्योग व बड़े बंगलों व कोठियों में रहते हैं, जिनका बिजली बिल होता तो भारी है लेकिन वे मीटरों पर मेग्रेट रखकर या मीटर से बाहर सीधी सप्लाई लेकर व रिश्वत देकर बिल को हल्का कर लेते हैं. इस कार्य के लिए बिजली विभाग के अधिकारी-कर्मचारी इन ब्लक कन्ज्यूमर्स से नियमित रूप से रिश्वत प्राप्त करते हैं जो अफसरों की काली कमाई बनता बढ़ता जाता है. ऐसे अधिकारी वेतन-भत्ते तो सरकार से पाते हैं, लेकिन फायदा ऐसे ब्लक कन्ज्यूमर्स का करते हैं और घाटा सरकार का और बिजली दरों का बढऩा उपभोक्ता का हो जाता है.

यदि कोई अफसर ईमानदार व सख्ती से काम करे तो बिजली विभाग के अधिकारी-कर्मचारी उसके प्रयत्नों को असफल करने और ब्लक कन्ज्यूमर्स की नौकरी व हिफाजत करने लगते हैं. ब्लक कन्ज्यूमर्स राजनैतिक व आर्थिक दृष्टिï से इतने समर्थ व शक्तिशाली होते हैं कि वह उस अफसर का ट्रान्सफर करवा देते हैं और सरकार भी उनके सामने नत-मस्तक होकर उस अधिकारी को ट्रान्सफर के बहाने हटा देते हैं.

मध्यप्रदेश में एक आई.ए.एस. अधिकारी श्री एम.एन. बुच ने यह साहस दिखाया था कि एक शासकीय बैठक में जब अफसरों को चुस्त और ईमानदार होने का उपदेश एक मुख्यमंत्री दे रहे थे तब श्री बुच ने कहा था जो अफसर ईमानदारी व साहस से काम करते हैं- उनका ट्रान्सफर कर दिया जाता है. हाल ही में भोपाल की म्युनिसिपिल कमिश्नर छबि भारद्वाज के मामले में भी ऐसा ही आभास हुआ.

एक आई.एस.एस. महिला अधिकारी ऋतु माहेश्वरी की पोस्टिंग कानपुर इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई सरकारी कंपनी में हुई तो उन्होंने चोरी रोकने के लिए सख्त कदम उठाये. लोगों के यहां स्मार्ट मीटर लगाये जाने लगे. जिनमें बिजली खपत का डिजीटल रिकार्ड दर्ज होता है. इससे पल पल हो रही बिजली की चोरी उजागर हो गयी. भारी विरोध के बावजूद उन्होंने 5 लाख में से लगभग दो लाख मीटर स्मार्ट डिजीटल कर दिये और कंपनी का घाटा आधा हो गया.

उनके अधिकारी व कर्मचारी काली कमाई रुकने से उनके कामों को बिगाडऩे लगे. उनका ख्याल था कि ये आई.ए.एस. अफसर बिजली और ग्रिड की बारीकियों को क्या समझेंगे. श्रीमती ऋतु महेश्वरी इंजीनियरिंग की ग्रेजुएट हैं. ये तकनीकी ज्ञान भी खूब रखती हैं. उनका स्टाफ उन्हें स्मार्ट मीटर लगाने से लेकर छापेमारी तक में बेईमानी पर उतर आये. छापों से पहले ही बिजली चोरों व ब्लक कन्ज्यूमर्स को बता देते थे और उनके पहुंचने से पहले ही वे अवैध कनेक्शन हटा देते हैं. जो अफसर छापेमारी में जाते हैं वे बिजली चोरों से भेंट लेकर अपनी रिपोर्ट में उन्हें बताते ही नहीं थे.

इस वजह से ऋतु माहेश्वरी बड़े लोगों या बड़े चोरों की निगाह में चढ़ गयीं, उन्हें रिश्वत देने की कोशिशें की गयीं- न लेने पर धमकियां भी दी गयीं और इन लोगों ने मंत्री व मंत्रालय स्तर पर अपने दबदबे से ऋतु माहेश्वरी का ट्रांसफर कर महज 11 महीने में बिजली कम्पनी से कलेक्टर गाजियाबाद के पद पर करा दिया. ऐसे शासन में यदि यह कहा भी जाता रहे कि अफसर ईमानदारी व साहस से काम करे और शासन भ्रष्टïाचार पर ‘जीरो टालरेंसÓ रखता है तो इन नारों मात्र से भ्रष्टïाचार कभी दूर नहीं होगा.

 

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