बिहार में 20 फरवरी को विधानसभा में जनता दल यूनाईटेड सरकार के मुख्यमंत्री श्री जीतनराम मांझी और इसी दल के सुप्रीमो श्री नितीश कुमार के बीच बहुमत के समर्थन का निर्णय होना था. दोनों ही अपने-अपने साथ बहुमत का दावा कर रहे थे. लेकिन विधानसभा की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही श्री जीतन राम मांझी ने राज्यपाल को अपने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा सौंप दिया. इसे स्वीकार किया गया और वे अगली सरकार बनने तक कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने रहेंगे. विधानसभा अनिश्चित काल (माने डाई) के लिये स्थगित कर दी गई. बिहार में क्लाईमेक्स आने से पहले ही ‘एन्टी क्लाईमेक्स’ आ गया.

सत्तारूढ़ जनता दल यूनाईटेड की आंतरिक उठापटक के इस दौर में कुछ बड़ी ही विचित्र घटनाएं घटीं. लोकसभा चुनाव में भारी पराजय के कारण मुख्यमंत्री श्री नीतिश कुमार ने पद त्याग कर अपने एक मंत्री जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया. बाद में उन्हें उनका काम या रंग-ढंग पसन्द नहीं आया तो उन्हें हटाकर पुन: मुख्यमंत्री बनाना चाहा- लेकिन श्री मांझी ने हटना स्वीकार नहीं किया और पार्टी में विभाजन हो गया. बहुमत के परस्पर विरोधी दावे हो गये और नौबत पार्टी के अन्दर से निकलकर बाहर की राजनैतिक लड़ाई बन गयी. प्रमुख विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने इस द्वन्द्व में जितना राजनैतिक लाभ लेना था, वह ले लिया.

स्पीकर के कुछ निर्णय बेतुके लग रहे हैं. विश्वास मत से एक दिन पहले प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की विपक्षी दल की मान्यता रद्द कर जनता दल यू. नितीश गुट को प्रमुख विपक्ष की मान्यता दे दी. यही दल बहुमत का दावा कर मुख्यमंत्री पद भी मांग रहा था. इस तरह स्पीकर के फैसले से बिहार विधानसभा में जनता दल यूनाईटेड पक्ष (बहुमत) व विपक्ष दोनों भूमिका में एक साथ आ गया. इसके साथ मांझी भी जनता दल यू. के बहुमत का दावा कर रहे थे. ऐसी स्थिति संभवत: पहले कभी नहीं आयी.

दूसरी ओर मुख्यमंत्री श्री मांझी ने यह मांग रख दी कि विधानसभा में विश्वास मत पर ‘गोपनीय मतदानÓ (सीक्रेट वैलट) की मांग कर दी. जो संसदीय नियमों प्रक्रिया व संविधान में होती नहीं है. वहां सदन (फ्लोर) में ध्वनि मत से और विभाजन (डिवीजन) मांगने पर वोटिंग मशीनों व लाबी रजिस्टर में रिकार्ड होता है. श्री मांझी की यह मांग बेतुकी थी जो नहीं मानी गयी.

बिहार विधानसभा में यह ऊटपटांग स्थिति बन गयी कि यही समझ में नहीं आ रहा कि वहां कौन पक्ष और कौन विपक्ष का सदस्य है. वहां स्पीकर ने भारतीय जनता पार्टी को विपक्ष से बेदखल कर दिया और वह सरकार में भी नहीं है तो फिर वह कहां है, क्या है.

विधानसभाओं में राष्टï्रपति चुनाव में गोपनीय मतदान होता है, लेकिन यह विधानसभा का काम न होकर चुनाव आयोग का काम होता है और उसमें विधानसभा सेक्रेटरी रिटर्निंग ऑफिसर की हैसियत से काम करता है. वह विधानसभा का काम व प्रक्रिया नहीं है इसलिये उसे यहां उल्लेखित नहीं किया जा सकता.

बिहार के राज्यपाल के सामने भी बड़ी विचित्र स्थिति हो गई है कि मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दे दिया और विधानसभा में यह तय ही नहीं हो पाया कि बहुमत किसके पास है और विधानसभा स्पीकर ने जनता दल यू. को ‘विपक्षÓ की मान्यता दे दी है. बुन्देलखंडी कहावत है ‘भर्रा मचा दरबार में- गधा पन्जीरी खायÓ यही स्थिति बिहार की राजनीति व विधानसभा में है. वहां कौन क्या है- कैसे है- क्यों है- यह किसी भी नियम प्रक्रिया में ‘फिट’ नहीं हो रहा है.

राज्यपाल किंकर्तव्य विमूढ़ की स्थिति में आ गये हैं. बोम्मई कांड में सुप्रीम कोर्ट में फैसला आ चुका है कि बहुमत विधानसभा के फ्लोर पर ही तय किया जाए.
उत्तरप्रदेश विधानसभा में भी एक बार ऐसी ही मिलती-जुलती स्थिति आयी थी जब दो लोगों ने एक साथ मुख्यमंत्री होने का दावा किया. उस समय स्पीकर ने स्वयं के नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही अपने चेम्बर में गोपनीय मतदान करा कर किस व्यक्ति को बहुमत प्राप्त था यह निर्णय किया था.
हो सकता है कि बिहार में यह प्रक्रिया अपनायी जाए जिसमें श्री मांझी की यह मांग समाहित हो सकती है कि बहुमत का फैसला गोपनीय मतदान से हो. यह भी हो सकता है कि इस भर्रे में बिहार में राष्ट्रपति शासन हो जाये या श्री नितीश को मुख्यमंत्री बना दिया जाए.

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