बैंकों का काम और व्यवसाय ही यही है कि वे राष्ट्र व समाज की हर आर्थिक, व्यापारिक, औद्योगिक व कृषि में पून्जी का आधार व सहयोग दे. लेकिन इस समय बैंकों में भी पून्जी का इतना ज्यादा अभाव हो गया है कि केन्द्र सरकार ने उनकी रंगत बदलने के लिये एक बहुत ही खास योजना ‘इन्द्रधनुष’ लान्च की है. इन्द्रधनुष में प्रकृति ने सातों रंग दिये हैं और सरकार ने भी राष्ट्रीयकृत सरकारी बैंकों का पून्जीगत स्वास्थ्य सुधारने के लिये इन्द्रधनुष योजना के तहत पर्याप्त पूंजी दी जायेगी. अभी तक बैंकों व वित्तीय प्रणाली का पूरा काम रिजर्व बैंक आफ इंडिया और उसके भी ऊपर भारत सरकार का वित्त मंत्रालय संचालित करता है.

आंतरिक प्रशासन व वित्तीय कामकाज में बैंकों को बहुत हद तक स्वायत्तता (आटोनामी) रहती है. इसी तरह रिजर्व बैंक भी भारत सरकार का संस्थान होने के बाद भी मौद्रिक नीति व प्रणाली पूर्ण स्वायत्तता रखता है. लेकिन अब बैंक व्यवस्था में केन्द्र सरकार ने बैंकों के संचालन के लिये एक नयी संस्था ‘बैंक बोर्ड ब्यूरोÓ गठित करने का निर्णय ले लिया है जो आगामी वर्ष एक अप्रैल से उसका काम शुरु कर देगा. इस बात का भी लगभग निर्णय हो ही चुका है कि कुछ वित्तीय मामलों में रिजर्व बैंक के गवर्नर को दिया गया ‘वीटोÓ पावर खत्म किया जाए. अभी इसका ऐलान नहीं हुआ है.
वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने कहा है कि ‘इन्द्रधनुषÓ का उद्देश्य सरकारी बैंकों में चौतरफा सुधार लाना है. अभी तक शिक्षा के क्षेत्र में लगातार ‘सुधारÓ के अजीबोगरीब प्रयोग होते रहे हैं. उसमें हालत यह हो गयी कि शिक्षा का स्वरूप ही अजीबोगरीब हो गया जैसे कि ‘वास्तुÓ विशेषज्ञ ने किसी मकान में ऐसा सुधार कराया हो कि जिससे वह मकान- मकान की जगह कबूतरखाना हो गया. अब सरकार वित्त में सुधार लाने के प्रयोग कर रही है.

बहुत साधारण सी बात है जो सभी को पता है कि बैंकों में पूजी अभाव क्यों हुआ. बैंकों ने अपने सामान्य कामकाज के रूप में उद्योगों-व्यापार व अन्य सभी आर्थिक गतिविधियों में पूंजी कर्ज के रूप में दी और उनसे कमाया ब्याज ही बैंकों की आमदनी है. लेकिन पिछले दो दशकों में विश्व व्यापी स्तर पर त्रासदायी मंदी का दौर चला. आयात-निर्यात व्यापार अस्त-व्यस्त हो गया, औद्योगिक शिथिलता आयी, जिसका असर भारत पर भी पड़ा. बैंकों के बड़े-बड़े कर्जदार बैंकों का कर्ज व ब्याज समय पर नहीं चुका पाये. हर बैंक की पूंजी उलझ कर बैंकिंग शब्दावली में ‘नॉन परफार्मिंग एसेटÓ हो गयी और बैंकों में पूंजी अभाव हो गया.
दूसरी ओर रिजर्व बैंक ने ‘कृषिÓ की सजा ‘उद्योगÓ को दे डाली. सरकार हर साल खाद्यान्नों के समर्थन मूल्य बढ़ाती गयी और उससे खाद्यान्नों के भाव बढ़ते गये. सरकार शक्कर के मूल्य इसलिये बढ़ाती गयी कि लागत बढ़ रही है और शक्कर मिलों को गन्ना किसानों का बहुत बकाया चुकाना है. डर पैदा हो गया कि अगर गन्ना किसानों ने तंग आकर गन्ना की खेती बंद या कम कर दी तो देश में स्थायी रूप से शक्कर का अभाव हो जायेगा. भारत में शक्कर का उत्पादन और खपत लगभग बराबर पर ही चलते हैं. कभी थोड़ी ज्यादा कभी कम उत्पादन हो जाता है जो ‘एडजस्ट’ हो जाता है.

रिजर्व बैंक पिछले दो दशकों से एक ही जिद पर कायम हैं कि जब तक खाद्यान्न मूल्यों में कमी और खाद्यान्न में मुद्रास्फीति कम नहीं होगी वह बैंकिंग और मौद्रिक व्यवस्था में पूंजी की ब्याज दरें कम नहीं करेगा. इस कारण भारत की औद्योगिक विकास दर सबसे ज्यादा रिकार्ड स्तर पर गिरकर 4 प्रतिशत पर आ गयी. रिजर्व बैंक की दलील थी कि मूल्य और मुद्रास्फीति को कम करना उसका काम नहीं है- वह सरकार को करना है और सरकार समर्थन मूल्य बढ़ाकर खाद्यान्न के मूल्य बढ़ाती ही गयी और यह इजाफïा अभी भी हर साल हो रहा है. बैंकों की रंगत तभी सुधरेगी जब उसका कर्ज व ब्याज ग्राहक लौटायेंगे.

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