बैंकों के घाटे ने देश के सामने एक बड़ी आर्थिक समस्या पैदा कर दी है कि यदि बैंकों खासकर सरकारी क्षेत्र के राष्टï्रीयकृत बैंकों को घाटे से उबार कर व्यापारिक (कमर्शियल) व आर्थिक रूप से सुधार व उन्नत करके नहीं चलाया गया तो वे ये दिवालिया हो जायेंगे और देश की आर्थिक व वित्तीय ढांचा ही ध्वस्त हो जायेगा.
बैंकिंग क्षेत्र में इस समय बड़ी ही अजीब स्थिति है. एक अर्से तक देश में कांग्रेस एकाधिकार का जबरदस्त मजबूती का केंद्र से राज्यों तक एकीकृत शासन रहा.

लेकिन इस प्रजातंत्रीय पार्टी में बैंकों के राष्टï्रीयकरण पर हमेशा तीव्र व गहन वैचारिक द्वंद चलता रहा. कांग्रेस में आजादी के पहले स्वाधीनता संग्राम के दिनों में आंतरिक राजनीति में नरम और गरम दल, पार्टी के अंदर ही पंडित मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में स्वराज पार्टी, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी भी चली. वैचारिक आधार के दक्षिण पंथी (राइटिस्ट) और वामपंथी (लेफ्टिस्ट) खेमे भी चलते है. आर्थिक मोर्चे पर पार्टी में बैंकों का राष्टï्रीयकरण सबसे अहम टकराव का मुद्दा रहा.

आजादी के बाद भी केंद्र सरकार में भी यह जबरदस्त वैचारिक द्वंद प्रधानमंत्री व उपप्रधानमंत्री श्री इंदिरा गांधी व श्री मोरारजी देसाई के बीच भी रहा. श्री देसाई बैंकों के राष्टï्रीयकरण के लिये तो तैयार नहीं और उन्होंने बैंकों का ‘समाजीकरणÓ सुझाया. यह शब्द पहली बार ही प्रयोग में आया- जिसे सभी ने यह माना कि मोरारजी राष्टï्रीकरण को उलझाये रखने के लिये एक शगूफा शब्द बोल रहे है.
इस वैचारिक द्वंद का नतीजा यह हुआ श्रीमती गांधी ने श्री देसाई से वित्त मंत्रालय वापस ले लिया और उनकी स्वभावगत दिलेरी से बैंकों का राष्टï्रीयकरण कर दिया. श्री देसाई को मंत्री मंडल से हटाया नहीं था लेकिन वे इतने आहत हुए कि स्वयं ही इस्तीफा देकर उप प्रधानमंत्री पद छोड़ बाहर चले गये और इंदिरा गांधी ने बैंकों को जन जन तक पहुंचा दिया. वह बड़े उद्योग-व्यापार व बड़े शहरों से बाहर भी छोटे-छोटे नगरों-कस्बों तक पहुंच गया.

समाज में आर्थिक चेतना व समृद्धि आने लगी. अब बैंकों को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने किया है. गांवों में बैंक खाते पहुंच गये. जीरो बैलेन्स पर भी गरीब का खाता खोल दिया. निश्चित ही बैंक, वित्तीय व आर्थिक व्यवस्था में दो बड़े क्रांतिकारी परिवर्तन श्रीमती गांधी व श्री मोदी ने किये है. प्रगति का अर्थ ही यह होता है कि वह आगे बढ़ती है और देश समाज उन्नत होता है. अब वह दौर आ गया है कि देश में सरकारी बैंकों के साथ-साथ निजी बैंकों को लाइसेंस दिया गया और वे वित्तीय व्यवस्था में आ भी गये. पोस्ट आफिस देश का सबसे पहला और आज तक का सबसे छोटा ‘सेविग्स बैंकÓ अब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के समकक्ष हर जगह मौजूद पोस्ट आफिसों के जरिये पोस्टल बैंक ऑफ इंडिया बनते जा रहा है.

ऐसे में बैंकों ने ‘एन.पी.ए.Ó (बकाया धन वसूल होना कर्जा) के नाम पर होवा खड़ा करके देश में ‘पेनिकÓ फैला दी. कर्जा देना ही बैंकों का मुख्य कार्य है. उसको देने व वसूल करने की भी निर्धारित प्रक्रिया होती है. गारंटर होते है- उनके पास कर्जदार की संपत्ति से भी वसूल करने का आधार होता है. सवाल यह है कि फिर एन.पी.ए. कर्जा डूबत में क्यों आ रहा है. उद्योग जगत ने सही प्रतिक्रिया जारी की है कि बैंक एन.पी.ए. पर ओवर रियेक्ट कर रहे है.

वैश्विक मंदी का ऐसा लंबा दौर चला है जो अभी भी कुछ हद तक कायम है कि अमेरिका के भी कई बड़े-बड़े बैंक लडख़ड़ा गये- एक तो बन्द हो गया. उद्योगों में निवेश इतना घटा कि वर्किंग केपिटल तक मुश्किल हो गयी, निर्मित व्सतुओं की मांग भी उपभोक्ताओं पर आई महंगाई में दब गयी. जी.डी.पी. और औद्योगिक वृद्धि दरें क्रेश कर गयी. स्वयं सरकार यह कहती रही कि वैश्विक अर्थ-व्यवस्था ही संकट में है. ग्रीस देश से यूरो जोन वित्तीय संकट में आ गया. एक पूरा राष्टï्र ही दिवालिया हो गया. बैंकों के एन.पी.ए. व घाटे को ‘हिमालयÓ बना दिया.

निजी क्षेत्र में नये बैंक भी खोले जा रहे हैं और सरकारी बैंकों को घाटे के कारण आपस में विलय किया जा रहा है. बैंकों को मजबूत करने के लिए विलय किया जाए- यह सही बात है, लेकिन घाटे के नाम पर या उन्हें बन्द कर दिया जाए या सक्षमता से कर्ज वसूली की जाए. देश की बैंकिंग व्यवस्था हर हाल में मजबूत होना भी चाहिए और दिखना भी चाहिए.

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