भोपाल में बैंक ऑफिसर्स के संगठनों की बैठक में कहा गया है कि बैंकों के घोटाले बैंकिंग सिस्टम के फेल्युअर (असफलता) का नतीजा है और बैंकों से सतर्कता में चूक गयी है. जबकि जो तत्व सामने आ चुके हैं उससे यह साबित होता है कि ये घोटाले बैंकिंग सिस्टम का फेल्युअर नहीं बल्कि बैंकिंग सिस्टम की प्लानिंग और सतर्कता से रची गयी साजिशें हैं.

बैंकों को उद्योगपतियों या व्यापारी वर्ग ने फंसाया नहीं है बल्कि बैंकों ने इन्हें फंसाया है कि कर्जा ले लो कोई उगाही या वसूली नहीं होगी. सब दबा पड़ा रहेगा. कहीं कुछ पता नहीं चलेगा. उद्योगपतियों- व्यापारियों पर जो वसूली बतायी जा रही है उसमें से 70-80 प्रतिशत रुपया बैंक अधिकारी खा गये और पूरा बकाया कर्जदारों पर निकालकर खुद को पाक-साफ दिखाने का प्रपंच रचा जा रहा है. बैंकों की एकाउंटिंग इस तरह की होती है कि एक रुपया भी कम या ज्यादा नहीं हो सकता.

विजय माल्या देश का बड़ा सम्मानीय व धनी उद्योगपति है. उसे बैंक वाले धोखोबाज- फ्राड, दिवालिया की तरह पेश कर रहे हैं. माल्या पर 9000 करोड़ रुपयों का बकाया निकाला जा रहा है. उसका कहना है कि उस पर इतना कर्ज नहीं है- बहुत ज्यादा बताया जा रहा है.

नीरव मोदी, मेहुल चोकसी पर 15000 करोड़ रुपयों का बकाया निकाला गया. जबकि उनका कहना है कि उन्हें सिर्फ 5000 करोड़ का कर्जा देना है. इसी से यह जाहिर हो गया कि कुल 15000 में से 10,000 करोड़ रुपया तो बैंक अधिकारी ही खा गये.

विजय माल्या व मोदी चोकसी व अन्य बकायादारों का यही कहना है कि इन कर्जों के बारे में बैंकों ने यह कहना था कि इनकी जानकारी जाहिर नहीं की जायेगी और अब पूरा बकाया उन पर निकालकर उन्हें देश के सामने इस बुरे रूप में पेश कर दिया जबकि असली फ्राड व धोखा बैंक में खुद अफसरों ने ही किया है.

बैंक ऑफिसर्स ने कहा है कि माल्या-मोदी-चोकसी जैसे कारोबारियों पर नकेल कसने में बैंकिंग सेक्टर की सतर्कता में बड़ी चूक हुई है. प्रक्रिया ठीक से नहीं हुई. सभी आडीटर्स ऐसे अधिकारियों से मिलीभगत करते है- ऐसा कहना ठीक नहीं होगा. लेकिन कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं इससे इंकार नहीं किया जा सकता. बैंक ऑफिसर्स ने यह भी माना कि लेटर आफ अंडरटेकिंग या लेटर आफ कम्फर्ट सिर्फ भारत के बैंकों में हैं और अब इसे बदला जा रहा है.

बैंक ऑफिसर्स की यह दलील भी गले नहीं उतरती कि माल्या-मोदी पर नकेल कसने में चूक हुई. अब तो यह जाहिर हो ही चुका है कि उन्हें उन पर नकेल कसनी ही नहीं थी- वसूली उगाही होनी ही नहीं थी. अब तो जरूरत इस बात की है कि बैंकों के ऑफिसरों पर ही केन्द्र सरकार और वित्त मंत्रालय को नकेल कसनी है.

असली दोषी बैंक आफिसर्स हैं- माल्या-मोदी व अन्य को तो उन्होंने अपना मोहरा बना दिया, रुपया बैंक अधिकारी खा गए और पूरा बकाया उन पर निकाल दिया. बैंक ऑफिसर्स यह भी मानते हैं कि देश में 9354 बिल्कुल डिफाल्टर्स हैं और इसी से जाहिर यह भी होता है कि ऐसे लाखों कर्जदार होंगे जो बिल्कुल डिफाल्टर में नहीं आते होंगे. सवाल यह है कि इनसे वसूली क्यों नहीं की गई और उसका जवाब स्वत: यह है कि बैंक अधिकारियों को यह करनी ही नहीं थी?