एक अर्से से केन्द्र सरकार जनरल बजट से सरकारी बैंकों को कामकाज जारी रखने के लिये करोड़ों रुपयों की वित्तीय सहायता देती आ रही है. संसद की एक समिति ने सरकार से कहा है बैंकों को सरकार द्वारा इस तरह का वित्तीय पोषण हमेशा नहीं चलाया जा सकता. सरकार को समय पर ऐसे कदम उठाने चाहिए कि बैंक हमेशा पून्जी की उपलब्धता बनाये रख सकें. उन्हें हमेशा सरकारी वित्त पोषण की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए. फाइनेंस पर संसद की स्टेन्डिंग कमेटी ने कहा है कि वित्त मंत्रालय को इस गंभीर मुद्दे पर सक्रिय ही रहना चाहिए कि सरकारी बैंकों की कमी पून्जी का अभाव इस हद तक न होने पाये जिसमें उन्हें स्वयं ही वित्तीय सहायता की जरूरत पड़े. सरकारी वित्त की आदत पडऩे से बैंकों की अक्षमता और अयोग्यता को ही बढ़ावा मिलेगा. बैंकों में अपने आंतरिक स्रोतों से ही पून्जी का भंडार रहना चाहिए.

इस समय हालत यह है कि केन्द्र ने एक चार-वर्षीय कार्यक्रम बनाया है जिसके अंतर्गत सरकारी बैंकों में 70,000 करोड़ रुपयों का वित्तीय पोषण किया जा रहा है. चालू वित्तीय वर्ष में उन्हें 12,010 करोड़ दिये जा रहे हैं.

प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा बैंकों का राष्टï्रीयकरण करने के बाद से अभी पिछले एक दशक से पहले तक सरकारी बैंकों का वित्तीय स्वास्थ्य बहुत अच्छा था. लेकिन पिछले दशक में विश्व में वैश्विक आर्थिक मंदी बहुत लंबे समय तक चली. पूरा अन्तरराष्टï्रीय आयात-निर्यात व्यापार अस्त-व्यस्त हो गया. इसी समय भारतीय उद्योग पर एक बहुत ही जबरदस्त घरेलू मार पड़ी कि रिजर्व बैंक ने कृषि अर्थव्यवस्था और खाद्यान्न मूल्यों में वृद्धि के कारण उत्पन्न मुद्रास्फीति को अपने बैंक दरों का आधार बना लिया है. उसका कहना था कि मुद्रास्फीति का प्रबंधन केंद्र व राज्य सरकारों का काम हैं. रिजर्व बैंक तो यथास्थिति को ही आधार बताता है. केंद्र सरकार के दो वित्त मंत्रियों श्री पी. चिदम्बरम् व श्री अरुण जेटली बराबर यह कहते रहे कि कृषि क्षेत्र व खाद्यान्न मूल्यों की मुद्रास्फीति के अलावा रिजर्व बैंक को समाज के सभी क्षेत्रों पर विशेष कर उद्योग जगत की वित्तीय जरूरतों को पूरा होने का वातावरण के लिए उसे बैंक ब्याज दरों को कम रखना चाहिये. रिजर्व बैंक ने ऐसा नहीं किया और भारतीय उद्योग महंगी पूंजी व बढ़े मूल्यों के कारण विश्व बाजार में दूसरे राष्टï्रों खासकर चीन से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाया.

यह एक बड़ी वजह रही जिस वजह से बैंकों के बड़े औद्योगिक कर्जदार बैंकों का कर्जा समय पर चुका नहीं पाये और बैंकों की शब्दावली में उनका एन.पी.ए. (नान परफार्मिंग एसेट) बढ़ती गयी. इस पर रिजर्व बैंक को भी भारी चिंता करनी पड़ी. यही एक बड़ा कारण है कि आज बैंकों के पास पूंजी का अभाव हो गया है और उद्योग-व्यापार वित्तीय पोषण करने वाले सरकारी बैंक को स्वयं सरकार से वित्तीय पोषण करना पड़ रहा है.

इसी समय यह संकेत भी आ गये हैं कि रिजर्व बैंक अभी बैंक दरों को आगामी मौद्रिक समीक्षा कम नहीं करेगा. पहले मुद्रास्फीति की बात होती रही अब रिजर्व बैंक का यह कहना है कि बैंक पहले डिपाजिट रेट घटाये तभी बैंक ब्याज दरों को कम करने की सोच सकता है. इधर केंद्र सरकार ने रिजर्व बैंक से कहा है कि वह पेट्रोल-डीजल के भावों में कमी करके सभी मूल्यों में कमी ले आयेगी और उसे बैंक ब्याज दरों को कम कर देना चाहिये.

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