इस तरह के संकेत आने लगे हैं कि अगली मौद्रिक समीक्षा एक नवगठित होने वाली मौद्रिक नीति समिति, भारत सरकार और रिजर्व बैंक आफ इंडिया के समायोजन व सहयोग से करेगी. हाल ही में चीन ने अपनी मुद्रा युआन का अवमूल्यन भी किया और बैंक दरों में कटौती करते हुए राजकीय कोष से चीन के बैंकों को विदेशी मुद्रा भी भारी मात्रा में उपलब्ध करायी. इससे उसने विदेशी निर्यात अपनी पकड़ जारी रखी.

रिजर्व बैंक के गवर्नर श्री रघुराम राजन ने चीन के मुद्दे पर कहा कि वह भारत का बड़ा व्यापारिक भागीदार के साथ बड़ा प्रतिस्पर्धा भी है. उसकी अर्थव्यवस्था में सुस्ती का असर भारत पर इतना ज्यादा नहीं होगा, जितना कि अन्य देशों पर होगा. अमेरिकी फेडरल रिजर्व बैंक की ब्याज दरों में ऐसे समय वृद्धि को लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल चल रही है.

श्री राजन ने पहली बार ही कहा है कि हमारी अर्थव्यवस्था में मुद्रा स्फीति है जो कि अन्य किसी अर्थव्यवस्थाओं में नहीं है. हमने इस साल अब तक तीन बार दर में कटौती की है और अभी भी हम तालमेल बिठाने के दौर में है. बैंकों की ब्याज दरें तय करने के लिये प्रस्तावित मौद्रिक नीति समिति बनाने के मुद्दे पर रिजर्व बैंक और भारत सरकार के साथ सहमति बन गई है. जिसकी जल्द ही घोषणा हो जायेगी. अब यह समिति प्रस्तावित मसौदे से अलग होगी जिसमें सरकार को बहुसंख्यक सदस्यों को नियुक्त करना था. उस मसौदे को लेकर विवाद खड़ा हो गया था. जिसके तहत रिजर्व बैंक के गवर्नर की अध्यक्षता वाली समिति में बहुसंख्यक सदस्यों को सरकार नियुक्त करती. प्रस्ताव में यह भी था कि चेयरमेन (गवर्नर) को प्राप्त वीटो पावर भी खत्म की जाये. फिलहाल गवर्नर के पास तकनीकी परामर्श समिति है जो मौद्रिक नीति पर परामर्श देती है. लेकिन उसके पास मौद्रिक समिति के निर्णयों या अनुशंसाओं को स्वीकार करने या उसे खारिज करने का अधिकार है.

रिजर्व बैंक जहां अभी तक पूर्व गवर्नर डी. सुब्बा राव के समय से अभी श्री राजन के समय तक खाद्यान्न मूल्य वृद्धि और खाद्यान्न मुद्रास्फीति को ही बैंक ब्याज दरों का आधार बनाये हुए हैं. उससे अर्थव्यवस्था के दूसरे घटकों के बारे में कोई ध्यान नहीं दिया. यूपीए शासन काल के केन्द्रीय वित्त मंत्री श्री पी. चिदम्बरम से लेकर आज तक भाजपा सरकार के वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली का रिजर्व बैंक से यही कहना रहा कि बैंक दरों के ज्यादा रहने से औद्योगिक मेन्युफेक्चरिंग क्षमता व उनमें पूंजी निवेश कम होता जाकर सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है. प्रतिस्पर्धी विदेशी राष्ट्रों में उद्योग-व्यापार को बहुत ही सस्ती दरों 2-3 प्रतिशत पर पून्जी मिल जाती है जबकि भारत में यह 13-14 प्रतिशत है. ऐसी स्थिति में भारत का उद्योग महंगी पून्जी से विश्व प्रतियोगिता में टिक ही नहीं सकता. इससे भारत का औद्योगिक निर्यात लगातार कम होता गया और उसका विपरीत असर भारत के मुद्रा भंडार पर भी पड़ा.

भारत में लगातार बम्पर फसलें आयी हैं. खाद्यान्न मूल्य इसलिये बढ़े कि सरकार हर साल समर्थन मूल्यों में वृद्धि करती गयी. खाद्यान्न के मूल्य खाद्यान्न के अभाव में नहीं बढ़े हैं. जब सरकार ने खुद मूल्य बढ़ाये हैं तब उसे मूल्य वृद्धि और खाद्यान्न मुद्रा स्फीति मानना ही गलत है.

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