जनमत के भारी विरोध व दबाव के कारण केंद्रीय वित्तमंत्री श्री अरूण जैटली ने कर्मचारी भविष्य निधि पर लगाया गया टैक्स वापस ले लिया है. लेकिन अभी भी वे इस बात पर गुनहगार बने हुए कि उन्होंने राष्टï्रीय पेंशन पर लगाया जा चुका टैक्स वापस नहीं लिया.

उन्होंने अपने रोलबैक पर यह तर्क दिया है कि उन्होंने भविष्य निधि पर टैक्स इसलिए लगाया था ताकि उसे एन.पी.एस. (नेशनल पेंशन स्कीम) के बराबर लाया जा सके. एन.पी.एस. से राशि निकासी के समय टैक्स लगता है. और ई.पी.एफ. (कर्मचारी भविष्य निधि) पर तीनों चरणों निवेश, ब्याज और तीनों चरणों पर टैक्स में छूट मिलती है, जो एन.पी.एस. में नहीं है.

इसलिए लोग एन.पी.ए. में आ नहीं रहे थे. सरकार का इरादा दोनों निधि व पेंशन में बराबरी लाने का था तो अब उसने जनमत के सामने नतमस्तक होते उसे भविष्य निधि से वापस ले लिया है तो बराबरी के सिद्धांत पर कायम रहते हुए उन्हें नेशनल पेंशन पर लगाया जा चुका टैक्स भी वापस ले लेना चाहिए था. इस स्कीम के लोगों की भी यही मांग है कि राष्टï्रीय पेंशन स्कीम भी भविष्य निधि की तरह कर मुक्त हो.

उसे भी निवेश ब्याज व धन निकासीय भविष्य निधि की तरह छूट दी जाए. प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी व केन्द्रीय वित्त मंत्री श्री जेटली पर दोनों फन्डों में बराबरी बनाये रखने का प्रशासनिक व नैतिक दायित्व है कि वे राष्ट्रीय पेंशन योजना को भी करमुक्त करें. इस योजना के साथ यह शासकीय वित्तीय भेदभाव बना हुआ है कि नेशनल पेंशन योजना से 60 प्रतिशत से ज्यादा रुपया निकालने पर टैक्स देना होगा.

भविष्य शब्द भी संदर्भ में देखा जाना चाहिए. बचपन का भविष्य जवानी होता है लेकिन अवस्था के आकलन में जवानी का भविष्य वृद्ध अवस्था होता है. उसे चाहे भविष्य निधि कहा जाए या पेंशन वह युवावस्था की कमाई से वृद्ध अवस्था की व्यवस्था होता है. इन दोनों को अवस्था की व्यवस्था भी कहा जाता है. भविष्य निधि और पेंशन उस समय मिलती है जब वह युवा अवस्था और लगातार कमाई से बाहर आकर अपना आयु प्राप्त समय घर व बच्चों के बीच सुख-चैन से बिताना चाहता है.

उसकी भविष्य निधि व पेंशन पर टैक्स लगाना सरकार का बहुत ही घृणित और अमानवीय कार्य है. इसके लिये श्री मोदी व श्री जेटली अभी भी धिक्कार के पात्र हैं. यह तो औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर लगाये गये ‘जजिया’ टैक्स की तरह अमानुषिक है. श्री जेटली को भविष्य निधि व नेशनल पेंशन दोनों को समान छूट देकर समान रखना चाहिए. केवल निधि पर छूट देकर वे कतई ही प्रशंसा के पात्र या दयावान नहीं माने जा सकते. वे पेंशनधारियों के प्रति अभी क्रूर बने हुए हैं.