नयी दिल्ली,  विदेश मामलों से जुडे विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की ओर से आयोजित ‘वन बेल्ट ,वन रोड ’ (ओबीओआर) बैठक में हिस्सा न लेने से देश को किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ है और यदि भविष्य में भारत को लगा कि यह उसके हित में है तो वह इस मेगा परियोजना का हिस्सा बन सकता है ।

यह विचार विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर की मौजूदगी में आयोजित समूह चर्चा में उभरकर सामने आया। भारत ने आेबीओआर का इस आधार पर बहिष्कार किया है कि इस चीन -पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का बडा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजर रहा है ।

इंस्टिच्यूट आफ डिफेंस स्टडीज ऐंड एनालिसिस के महानिदेशक जयंत सिन्हा का कहना था कि चीन के उस बयान पर पूरी तरह यकीन नहीं किया जाना चाहिए जिसमें उसने कहा है कि यह परियोजना भारत के लिए फायदेमंद साबित होगी। नेपाल और अफगानिस्तान में भारत के दूत रहे श्री सिन्हा ने कहा ,‘ हम यह नहीं कह रहे हैं कि हम कभी भी ओबीओआर का हिस्सा नहीं बनेंगे क्योंकि हम सब एशिया ढांचागत निवेश बोर्ड में चीन के साथ सहयोग कर रहे हैं ।

यह बोर्ड मुल्तान में सडक की एक बडी परियोजना के लिए वित्त उपलब्ध करा रहा है ।’ श्री सिन्हा ने कहा कि भारत की पहली प्राथमिकता पूर्वोत्तर में संपर्क बढाना है। उन्होंने कहा कि ‘बंगलादेश -चीन -भारत -म्यांमार योजना’ पर भी भारत काम कर रहा है । सेंटर फार चाइना एनालिसिस के प्रमुख जयदेव रानाडे ने कहा कि ओबीओआर पर अभी काम जारी है लेकिन इसे लेकर हव्वा खडा किया गया है । यह अभी सिर्फ एक विचार है । हम बाद में इसमें शामिल हो सकते हैं ।

उन्होंने कहा कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ओबीओआर में भारी निवेश किया है। वह इसे क्रांतकारी बता रहे हैं लेकिन पश्चिम के विकसित देशों ने इस परियोजना में शामिल होेेन में रूचि नहीं दिखायी है । श्री रानाडे ने कहा कि चीन के कुछ विशेषज्ञों का भी कहना है कि ओबीओआर में भारत का शामिल नहीं होना परियोजना के लिए ठीक नहीं होगा। यह चर्चा ‘भारतीय कूटनीति 2020 भारत की ताकत ’ विषय पर आयोजित की गयी थी । इस मौके पर विदेश मामलों पर समर्पित एक नयी पत्रिका का विमोचन किया गया जिसका शीर्षक है ‘ इंडिया ऐंड वर्ल्ड ’। इसका विमोचन श्री अकबर ने किया।

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