अब भारत पर यह गुरुतर नैतिक दायित्व आ गया है कि दुनिया में उसके शिक्षा स्तर व विश्वविद्यालयों का नाम भी दुनिया में आक्सफोर्ड, केम्ब्रिज और हावर्ड विश्वविद्यालय के समरूप या उससे भी ऊंचा समझा जाए. वह जमाना गुजरे कई सदियां बीत गयी हैं जब भारत शिक्षा में नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों के नाम दुनिया में शिक्षा शिखर पर बैठा था. आज एक तक्षशिला पुरातत्वीय स्मारक के रूप में पाकिस्तान में चला गया है और दूसरा नालन्दा बिहार राज्य में पुरातत्वीय खंडहर के रूप में पर्यटन स्थल ही बनकर रह गया है. खबर तो यह है कि इसे फिर से उसी वैभव व उद्देश्य के साथ विश्वविद्यालय के रूप में पुनर्जीवित करने का इरादा है.

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान देश को यह सौगात देने जा रहे हैं कि सांची बौद्ध स्थल क्षेत्र में एक बौद्ध व सनातन धर्म विश्वविद्यालय बनाना शुरू कर दिया है. यह बहुत ही उपयुक्त रहेगा यदि नामकरण में इसका नाम ‘तक्षशिलाÓ विश्वविद्यालय रखा जाए. नये युग में हमें यह खिताब स्वयं ही हासिल हो गया कि हम दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र है. अब यह खिताब भी द्वार पर आ गया है कि हम विश्व में खासकर एशिया में संसार की तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था हैं. जब भारत के आसपास के देशों में प्रजातंत्र को आघात लगे, फौजी सरकारें बन गयीं तब भी भारत राजनैतिक महासागर में प्रजातंत्र का लाइट हाऊस बना अटल प्रजातंत्र रहा.

आजादी से पहले तो उच्च शिक्षा के लिये भारतीय इंग्लैंड में ऑक्सफोर्ड, केम्ब्रिज विश्व- विद्यालयों में और अमेरिका के हावर्ड विश्वविद्यालय जाते थे. अभी भी बहुत से भारतीय इन देशों में उच्च शिक्षा के लिये जा रहे हैं.

लेकिन अब भारत में भी विदेशी छात्र शिक्षा के लिये भारी संख्या में आ रहे हैं. इनमें सन् 2014 के मुकाबले सन् 2015 में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
फ्रान्स से आने वाले छात्रों की संख्या में तिगुनी- 214 प्रतिशत, जर्मनी से आये छात्रों में 124 और जापानी छात्रों में 123 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. चीन के छात्र 123 और दक्षिण कोरिया के छात्र 43 प्रतिशत बढ़े हैं. सन् 2015 में भारत में 66,885 छात्र भारत आये जो 2014 में 44,620 थे. बंगलादेश व अफगानिस्तान से आने वाले छात्रों में क्रमश: 670 और 112 प्रतिशत वृद्धि हुई है. सभी अफ्रीकी देशों के छात्रों की दिशा भारत ही है.

इसे देखते हुए भारत सरकार राज्य सरकारों व सभी भारतवासियों का यह नैतिक दायित्व बनता है कि उसके विश्वविद्यालय आदर्श और अतिउन्नत शिक्षा के केन्द्र माने जायें. आजादी से पहले और उसके बाद भी कई वर्षों देश में बनारस,

इलाहाबाद, कलकत्ता और तमिलनाडु के अन्नामलाई विश्वविद्यालयों का बड़ा नाम था. इलाहाबाद विश्वविद्यालय को आई.सी.एस. और बाद में आई.ए.एस. देने वाला का कहा जाता था. लेकिन इस समय देश के विश्वविद्यालयों का विश्व स्तर पर कहीं नाम ही नहीं आ रहा है. यह बड़ा दुखद और आत्म निन्दा के साथ आत्मचिन्तन का भी विषय है. हम दुनिया में सबसे बड़ा प्रजातंत्र, द्रुतगामी अर्थ-व्यवस्था के साथ अति उन्नत शिक्षा का केन्द्र व देश बने.

भारत भर में जिस तरह स्कूलों व विश्वविद्यालयों में सामूहिक नकल, व्यापमं जैसे उच्च स्तर पर भ्रष्टïाचार के घपले, हाल ही के दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शिक्षा से विमुख राजनैतिक आपराधिक विवाद अच्छे संकेत नहीं हैं. जब सारी दुनिया से शिक्षा के लिये छात्र भारत आ रहे हैं तो हमें भी दुनिया में अपने आप शिक्षा में शिखर राष्टï्र के रूप में प्रस्तुत करने का हम सब पर बहुत बड़ा नैतिक व राष्टï्र स्वाभिमान का दायित्व बनता है.

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