इन दिनों भारत की विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज चीन की शासकीय यात्रा पर वहां हैं और चीन के विदेश मंत्री श्री वांग यी से सकारात्मक वार्ता भी हुई है. डोकलाम में भारत-चीन के बीच युद्धक स्थिति की 71 दिवसीय तनातनी के बाद से दोनों देशों के बीच संबंधों में खटास आ गयी है.

चीन ने उस समय नाथूला दर्रा से होकर भारत के तीर्थयात्रियों की कैलाश मानसरोवर की यात्रा बंद कर दी और ब्रह्मपुत्र व सतलज नदियों का हाईड्रोलोजिकल डाटा देने से भी इंंकार कर दिया. अभी श्रीमती स्वराज व वांग यी की वार्ता में चीन ने यह कहा है कि नाथूला पास (दर्रा) होकर भारत के तीर्थयात्रियों की यात्रा को बहाल किया जाता है और चीन दोनो नदियों पर भारत को हाईड्रोलोजिकल डाटा भी देता रहेगा.

श्रीमती स्वराज ने चीन के इन कदमों का स्वागत किया. दोनों के संबंध में डोकलाम के बाद दूरी खत्म होती नजर आ रही है और वार्ता में सद्भाव सहयोग नजर आ रहा है. दोनों दोनों के बीच भी व्यापार भी बढ़ रहा है. 24 अप्रैल को बिजिंग में शंघाई को-आपरेशन आर्गेनाइजेशन की एक बैठक हो रही है और श्रीमती स्वराज इसमें भाग ले रही हैं. साथ ही इसी में भाग लेने भारत की रक्षा मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण भी चीन पहुंच गयी हैं.

एक अर्से से चीन प्रशांत महासागर में अपनी समुद्री सीमाएं बढ़ाना चाहता है और हाल के ही दिनों में चीन ने हिन्द महासागर में भी अपने युद्धपोत भेजे हैं. संभावना है कि श्रीमती सीतारमण से इस बारे में कुछ चर्चा हो. डोकलाम के बाद रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री स्तर पर दोनों देशों के बीच वार्ताओं से दोनों देशों में तनाव में काफी कमी दिखायी देने लगी है.

आगामी जून में किंगदाओ में होने वाली इस आर्गेनाइजेशन की शिखर बैठक होने जा रही है. भारत और पाकिस्तान इस संगठन के सदस्य बन गये है.

इन वार्ता सम्मेलनों में सबसे प्रमुख वार्ता भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति श्री जिनपिंग के बीच शिखर वार्ता चीन के शहर वुहान में 27-28 अप्रैल को होगी. एक ही समय में लगातार भारत चीन के बीच विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति वार्ताओं का दौर चल जाना बहुत बड़ी बात है और यह इशारा भी है कि दोनों देशों के बीच सद्भाव व सहयोग बढ़ रहा है लेकिन पूर्व अनुभवों के आधार पर यह भी विदित ही है कि दोनों देशों के बीच ‘ब्लो हाट-ब्लो कोल्ड’ के संबंध रहे हैं.

कभी भी किसी भी बात पर तनाव और टकराव की स्थितियां बन जाती हैं. भारत अब कभी पंचशील की शांति और 1962 की अशांति वाली स्थिति में दुबारा नहीं पड़ेगा. अब भारत सद्भाव व मित्रता में आगे बढ़ता है तो डोकलाम जैसी स्थिति में तन के खड़ा भी हो जाता है. वह प्रशांत महासागर में चीन के दावे को स्वीकार नहीं करता है और दूसरे देश इस मामले में भारत की अगुवायी को जानते हैं.

भारत ने चीन के विरोध के बावजूद वियतनाम में तेल खनन का काम जारी रखा है. अब भारत-चीन के संबंधों की बुनियाद इस पर टिक गयी है वह उन सभी अच्छी बुरी स्थिति के लिये तैयार है जो भी सामने आ जायेगी. चीन इन दिनों विस्तारवाद पर चल रहा है और भारत इस मामले में उसके किसी दावे को स्वीकार नहीं करता. चीन को अपना विस्तारवाद छोडक़र यह मानना ही पड़ेगा कि अरुणाचल भारत का भूभाग है.