भारत और चीन के बीच व्यापार में काफी असंतुल आ चुका है. जिससे भुगतान संतुलन भारत के विरुद्ध एक अर्से से चल रहा है जिसे व्यापार घाटा (ट्रेड डेफीशिट) की स्थिति हो गई है. भारत का एक लंबे समय से चीन से आयात ज्यादा और निर्यात कम हो रहा है.

भारत कपास का सबसे ज्यादा निर्यात करता है. भारत और चीन दोनों ही इतने बड़े क्षेत्रफल और विपुल आबादी के देश है कि इनका उत्पादन काफी होने के बाद भी इन्हें कभी कम उत्पादन की दिशा में आयात भी करना पड़ता है.

अमेरिका ने काफी अंतराष्ट्रीय दबाव बना कर दुनिया में डब्लू.टी.ए. (वल्र्ड ट्रेड एग्रीमेन्ट) तो करा लिया लेकिन अब यही एग्रीमेन्ट उसे भारी पड़ रहा है. चीन ने अमेरिका में अपना सामान वहां के समान से इतना सस्ता कर भर दिया कि जो बाहर के देशों के लिये वहां जातेे है तो खरीददारी में यह पातेे है कि वह अमेरिका ‘मेड इन चाइना’ का सामान खरीद रहे है.

अब राष्ट्रपति ट्रम्प ने आतेे ही चीन की डम्पिंग से चितिंत होकर (हायर अमेरिकन बाय अमेरिकन) अमेरिकी लोगों को रोजगार और अमेरिकी माल की खरीददारी की नीति अपनानी पड़ी. जैसे भारत में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सरकार में आते ही ‘मेक इन इंडिया’ की नीति बनायी है.

भारत में भी चीन ने इतना सस्ता और घटिया सामान भर दिया जो स्वास्थ्य के लिये हानिकारक था. उसके टार्च के सेल दो चार दिन ही चलते थे. उसके स्क्रूड्राइवर कैंची, छुरी जैसे औजारों की धार ही टूट जाती है.

ऐसे सामान की उसने भारत में ऐसी डंपिंग कर दी कि देश में हर जगह ‘चाइना बाजार’ कायम हो गये. बच्चों के खिलौने के रंग जहरीले थे. देश में हर जगह इन सस्ते सामानों के ‘चाइना बाजार’ कायम होने लगे और इस तरह की डंपिंग से भी भारत और चीन के बीच भुगतान संतुलन बिगड़ गया.

भारत में एक अरसे से जापान और दक्षिण कोरिया से इलेक्ट्रोनिक सामान के रूप में ऊंची क्वालिटी का माल आता है. मोबाइल फोन, टी.वी., वाशिंग मशीन आदि इनके ब्रेंड नाम बड़ी ऊंची क्वालिटी का माल होते हैं. चीन ने सस्ता मोबाइल यहां ऐसा भेजा है जो कानों के लिये हानिकारक साबित हो रहा है.

अब भारत ने यह स्पष्टï किया है कि चीन यदि भारत से आयात नहीं बढ़ायेगा तो भारत को भुगतान संतुलत को सही रखने के लिये कदम उठाने होंगे. चीन के माल पर अमेरिका ने भारी इम्पोर्ट ड्यूटी लगाने से चीन का आर्थिक आधार डगमगा गया. उसे यह आशंका हो गयी है यदि भारत ने भी ऐसे कदम उठाये तो उसकी पूरी इकानामी अस्त व्यस्त हो जायेगी.

भारत की चिंताओं को समझते हुए चीन ने भारत से व्यापारिक संबंध सुधारने की इच्छा व्यक्त की है. अब चीन कपास के अलावा भारत से सोयाबीन, शक्कर, चावल और सरसो भी खरीदने के लिये राजी हो गया है.

चीन के वाणिज्य मंत्री जान्गशैन भारत के दौरे पर आकर इस संबंध में वार्ता कर रहे हैं कि भारत के ट्रेड डेफीशिट को कैसे कम किया जा सकता है. डब्ल्यूटी.ए. बाद भी वैश्विक बाजार में संरक्षणवादी नीतियों से दुनिया में ट्रेड वार (व्यापार युद्ध) प्रारंभ हो गया है. अमेरिका अब तक दो बार इम्पोर्ट टेरिफ बढ़ा चुका है.

भारत ने चीन से कहा है कि वह 250 फार्मास्यूटिकल (दवाईयां) चीन को निर्यात करना चाहता है. अभी चीन से दवाईयों के लिये बल्क प्रोडक्टों (दवाई का मूल केमिकल) अभी भारत बड़ी मात्रा में आयात करता है. अब उनसे निर्मित दवाईयां वहां भेजना चाहता है.

भारत के कुल निर्यात की सबसे अधिक हिस्सेदारी 16 प्रतिशत अमेरिका से है- वह अमेरिका से निर्यात ज्यादा करता है. भारत को चीन को किया जाने वाला निर्यात 3.42 प्रतिशत है. चीन का भारत के साथ व्यापार बढ़ाना उसकी बड़ी जरूरत है और वह भारत से ज्यादा आयात करेगा और भारत का निर्यात बढ़ेगा.

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