नेपाल के नये संविधान में ‘मैदानी’ नेपाली समुदाय मधेशियों के साथ किये गये भेदभाव पर नेपाल ने अकारण ही भारत पर उसका दोषारोपण और शत्रुता व दूरी का माहौल बना दिया. आर्थिक दृष्टिï से मधेशियों ने नेपाल में भारत से किया जाने वाला व्यापार व माल सप्लाई उनकी सीमा में सड़कें जाम कर रोक दिया. यह उनकी ही निर्मित आर्थिक नाकाबंदी हो गयी. नेपाल के राजनैतिक व आर्थिक संकट में भारत सरकार या यहां के लोगों की कोई भूमिका नहीं है.

राजनैतिक दृष्टिï से भारत को यह बात धमकी के रूप में कही जाने लगी कि यदि भारत से माल सप्लायी नहीं हुई तो वह चीन से अपने व्यापारिक संबंध बना लेगा. चीन ने उसे कुछ पेट्रोल-डीजल भेजा भी था. लेकिन भौगोलिक परिस्थितियां में उसका चलना संभव नहीं था.

अब नेपाल सरकार ने संविधान में मधेशियों के साथ हो गयी विषमताओं को दूर करने के लिये राजनैतिक प्रयास प्रारंभ कर दिये और वहां की सरकार ने भारत के प्रति उसके द्रोह व दोष को उसकी भूल माना है. इसी भूल को ठीक करने के लिये नेपाल के प्रधानमंत्री श्री के.पी. शर्मा ओली अपनी 6 दिन की भारत यात्रा पर भारत आये हुए है.

दिल्ली में प्रधानमंत्री श्री मोदी से उनकी वार्ता भी हो गयी है. दिल्ली आते ही उन्होंने कहा कि उनका यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत और नेपाल के बीच आ गयी दूरी को खत्म कर फिर से नया सुखद व आत्मीय संबंध बनाना है. श्री ओली ने कहा है कि नेपाल में भारत का विकल्प चीन नहीं बन सकता है. श्री मोदी ने भी श्री मोली को यह भरोसा दिया है कि नेपाल को विकसित करने में भारत कोई कसर नहीं छोड़ेगा.

भारत और नेपाल के बीच इस वार्ता में नौ समझौते भी हो गये हैं और नये संबंधों का प्रारंभ हो गया है. इसमें बिजली, सड़क निर्माण, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, बन्दरगाह से जुडऩे के लिये रेल सम्पर्क और बंगलादेश तक सड़क व रेल परागमन की सुविधा के बारे में हैं. श्री मोली भारत यात्रा के दौरान उत्तरप्रदेश में टिहरी बांध व गुजरात में भुज भी जायेंगे.

नेपाल की भौगोलिक स्थिति दो भागों में पहाड़ी और मैदानी है. हर राष्ट्र की अलग-अलग तरह ऐसी रचनाएं होती हैं, लेकिन कोई भी उन्हें राष्ट्र की जनता का विभाजन नहीं बनाता है. नेपाल में पहाड़ी लोग अपने को मूल नेपाली और दक्षिण में मैदानी इलाकों के बसे मधेशियों को आज तक प्रवासी और गैर-नेपाली इसलिये मान रहे हैं कि उनके पूर्वज सदियों पूर्व भारत के उत्तरप्रदेश व बिहार से आकर बसे थे और वे भोजपुरी व मधेशी भाषा बोलते हैं. सीमाओं पर ऐसा होता है.

भारत में पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग क्षेत्र में नेपाली भाषा बोलने वाले गोरखा का बहुमत है जो सदियों पूर्व नेपाल से आकर बस चुके हैं. वे तो पश्चिम बंगाल से पृथक गोरखालैंड राज्य की मांग करते हैं. उनके नेता सुभाष घीसिंग ने लम्बे अर्से तक जहां उग्र आन्दोलन चलाया. अब वहां पश्चिम बंगाल के अंतर्गत ही स्वशासी प्रक्षेत्र बना दिया गया है. भारत दार्जीलिंग क्षेत्र के गोरखाओं को पूरा भारतीय ही मानता है.

नेपाल के लोगों व सरकार को भी भारत की गोरखा नीति की तरह मधेशियों को भी नेपाल का बराबर का नागरिक मानकर उन्हें संविधान में बराबर का दर्जा
देना चाहिए.

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