भारत के लिए यह दु:खद स्थिति है कि अकारण ही नेपाल के साथ उसके संबंधों में तनाव बढ़ता जा रहा है. इसमें न तो भारत की कोई भूमिका है और न ही भारत नेपाल की घरेलू समस्याओं में कुछ कर सकता है. जो कुछ है वह उनका खुद का मामला है और उसे उन्हें ही हल करना है.

परंपरा से भारत और नेपाल के खास कर सीमावर्ती राज्यों में या व्यापार में एक-दूसरे की मुद्रा परस्पर चलन में थी. इसलिए खुले तौर पर स्वीकार की जाती रही. अब नेपाल ने अपने देश में भारतीय मुद्रा को स्वीकार करना बंद कर दिया है. तनाव बढ़ते हुए यहां तक आ गया है कि उसने अपने देश में भारतीय टी.वी. चैनलों व हिन्दी फिल्मों का प्रदर्शन भी रोक दिया है.

वहां जो नया संविधान बनाया गया है उससे देश के उत्तरी भाग में रहने वाले ‘पहाड़ीÓ लोगों को मूल नेपाली व दक्षिण मैदानी भाग में रहने वालों को मधेशी के नाम से प्रवासी माना गया है. उन्हें पहाड़ी के समकक्ष न मानकर उससे कमतर दर्जे का माना गया है. इस मुद्दे पर मधेशी प्रतिकार पर उतर आये. उनके हाथ में पूरा खेती योग्य दक्षिण का मैदानी इलाका है, जो भारतीय राज्यों बिहार व उत्तरप्रदेश की सीमाओं से लगता है. नेपाल की अधिकांश जीवन की जरूरतों की लगभग सभी वस्तुएं भारत से आती है. भारत वाहनों का प्रवेश दक्षिणी नेपाल के मधेशी इलाकों से होता है. उनके संविधान प्रतिकार आंदोलन में वे भारत से माल सप्लाई के ट्रक नेपाल में जाने नहीं दे रहे हैं. इसकी वजह से वहां हर वस्तु का अभाव हो गया है. नेपाल सरकार व पहाड़ी लोग इसे भारत की आर्थिक नाकाबन्दी कह रहे हैं. भारत का कहना है कि यह नाकाबन्दी उसके नागरिकों ने ही कर रखी है. वह उसे खुलवा दे तो भारत से सप्लाई फौरन बहाल हो जायेगी. एन्ट्री पाइन्टों पर माल से लदे ट्रक खड़े हैं, लेकिन वे अनिश्चित काल तक तो उस स्थिति में नहीं रह सकते.

नेपाल के कतिपय पहाड़ी वर्ग के नेताओं के बयान इतने बेतुके आ रहे हैं जिनमें न तो यथार्थ है और न ही उससे स्थिति में कुछ सुधार आ सकता है.

नेपाली सत्तारूढ़ दल के सचिव श्री प्रदीप ग्यावली ने कहा है कि नेपाल भारत से सौहार्दपूर्ण समानता व संतुलित आधार पर संबंध बनाये रखना चाहता है. लेकिन वह भारत की धौंस स्वीकार नहीं करेगा. कभी नेपाल की तरफ से ही यह धौंस की तरह भारत से कहा जाता है कि यदि उसके यहां सामान की आपूर्ति यथावत् नहीं बनी रही तो वह चीन से व्यापार करने लगेगा.

भारत का कहना है कि माल सप्लाई उसके मधेसी नागरिक ही नहीं होने देते हैं और जहां तक चीन से व्यापार का सवाल है- नेपाल एक स्वतंत्र राष्टï्र है जिससे चाहे व्यापार करे. उसकी धौंस भारत को क्यों दी जा रही है.

भारत को एक बार पहले भी ऐसी समस्या श्रीलंका के साथ हुई थी. सदियों पहले भारत के तमिल भाषी श्रीलंका के चाय बागानों में गये और वहां बस गये. वे वहां के नागरिक हैं जो तमिल भाषा बोलते हैं. श्रीलंका की राष्ट्रीय भाषा सिंघली है. इसी आधार पर तमिलों में भेदभाव हुआ और प्रतिकार में लिट्टे जैसे संगठन विद्रोही गतिविधियों में लिप्त हो गये. उसमें भारत का कोई दखल नहीं था- फिर भी भारत को राजनैतिक व सैनिक (शांति वाहनी) के रूप में वहां उलझना पड़ा. वैसा ही स्थिति इस समय नेपाल में है.

नेपाल सरकार को ही अपने ही देश में संविधान व मधेशी समस्या का निराकरण करना है. भारत उसमें कुछ कर नहीं सकता है. नेपाल सरकार बजाय असंयत बयानबाजी के यह बताये कि वह भारत की तरफ से क्या कार्यवाही चाहता है.

Related Posts: