पाकिस्तान के प्रधानमंत्री श्री नवाज शरीफ ने कहा कि वे भारत के साथ बिना शर्त वार्ता करने के लिये तैयार है. साथ ही कुछ दिनों पूर्व उन्होंने यह कहा कि दोनों देशों के बीच काश्मीर ‘कोर इशूÓ है और बिना उसे हल किये संबंध सामान्य नहीं हो सकते. उन्होंने अपने नये प्रस्ताव में कहा कि दोनों के बीच क्षेत्र में शांति व स्थिरता के लिये वे वार्ता चाहते है. दूसरी तरफ उनका यह रवैया रहा कि दो बार भारत और पाकिस्तान के बीच विदेश सचिव स्तर की निर्धारित वार्ता इसलिये नहीं हो सकी कि वार्ता से पूर्व पाकिस्तान के भारत स्थित उच्चायुक्त ने काश्मीर के भारत विरोधी हुरियत व जमाते इस्लामी के नेताओं को वार्ता के लिये दिल्ली आमंत्रित किया.

इसी कारण भारतको विवश होकर उन वार्ताओं को रद्द करना पड़ा. ऐसे अनुभवों के बीच श्री शरीफ के ताजा प्रस्तावों में शांति स्थापित करने की बात कही गयी है और हाल ही कुछ महिनों में काश्मीर में पाकिस्तान की फौजों द्वारा बार-बार नियंत्रण रेखा का उल्लंघन व गोली बारी है. आतंकियों की घुसपैठ करायी गयी है और तंगधार में भारत के आर्मी बेस पर आत्मघाती हमला किया गया.

पाकिस्तान का रुख हमेशा विरोधाभासों से भरा रहता है.पाकिस्तान इसके लिये बराबर प्रयासरत् रहता है कि काश्मीर मसले में तीसरा पक्ष शामिल किया जाए. वह चाहे कोई तीसरा राष्टï्र हो या काश्मीर के भारत विरोधी हुरियत या जमाते इस्लामी संस्थाा. जबकि बंगलादेश युद्ध व स्वाधीनता के बाद भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी व पाकिस्तान के राष्टï्रपति श्री जुल्फिकार अली भुटटो ने शिमला समझौते में यह तय किया कि काश्मीर का मसला संयुक्त राष्ट्र से उठा लिया जाए और वह दोनों का द्विपक्षीय मामला बनाया गया. इसके परिपालन में संयुक्त राष्ट्र निगरानी की युद्धविराम रेखा को खत्म कर उसे नियंत्रण रेखा (लाइन ऑफ कन्ट्रोल) नाम दिया गया और संयुक्त राष्टï्र के पर्यवेक्षक वहां से वापस चले गये. संयुक्त राष्ट्र व अन्य देशों ने भी यह मान लिया है कि अब काश्मीर का मसला भारत-पाकिस्तान का आपसी व द्विपक्षीय मामला है.

पाकिस्तान के प्रयास करने पर र्भी संयुक्त राष्टï्र व अन्य कई देशों ने बीच में पडऩे से साफ इंकार कर दिया है. इस स्थिति में पाकिस्तान व उसकी खुफिया एजेन्सी आई.एस.आई. स्वयं और आतंकियों को काश्मीर में घुसपैठ कराकर भारत के समक्ष यह स्थिति लाना चाहते हैं कि काश्मीर वार्ता में अगर तीसरा राष्ट्र नहीं आ सकता तो तीसरा पक्ष काश्मीर के हुरियत व जमाते इस्लामी को माना जाए. इसी फेर में वह जब भी भारत-पाक वार्ता किसी भी स्तर की तय होती है उससे पहले हुरियत के नेताओं को वह आमंत्रित करता है. ऐसे वातावरण में दोनों देशों के बीच आगे कैसे वार्ता हो सकती है. नियंत्रण रेखा पर गोली भी चलती जा रही है और शरीफ शांति स्थापना की भी बात कर रहे हैं.

भारत ने स्वयं 1948 में संयुक्त राष्टï्र को यह मसला भेजा था कि पाकिस्तान ने काश्मीर पर हमला व कब्जा किया है. संयुक्त राष्टï्र का मूल प्रस्ताव यही था कि पहले वहां से पाकिस्तान अपनी सेनाएं हटाये उसके बाद संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में वहां जनमत संग्रह होगा. प्रस्ताव के अनुसार पाकिस्तान ने कभी फौजें हटाई नहीं और इसके कारण आगे कोई कार्यवाही न हो सकी. 22 साल तक संयुक्त राष्ट्र में मसला उलझता ही चला गया. अन्त में श्रीमती गांधी व श्री भुट्टïो ने उसे वहां से उठा लिया.

पाकिस्तान की नीयत ही साफ नहीं है. आगे वार्ता कैसे हो.

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