भारत और पाकिस्तान के बीच विशेषकर काश्मीर को लेकर कोई वार्ता होना या होने के कार्यक्रम बनाना दोनों ही दोनों देश की अर्थहीन कूटनीति ही है. अभी हाल ही रूस में शंघाई सहयोग के शिखर सम्मेलन में यह तय हुआ कि परस्पर संबंध बढ़ाने के लिए दोनों के सुरक्षा अधिकारी (नेशनल सिक्युरिटी आथेरिटी) स्तर की बात की जाए. इसके लिये 23-24 अगस्त को बैठक-वार्ता का कार्यक्रम भी बना. लेकिन इस पर संशय पैदा हो गया है कि यह होगी या रद्द कर दी जायेगी. भारत में पाकिस्तान के सुरक्षा अधिकारी सरताज अजीज ने फिर उसी तरह की हरकत की है जिसकी वजह से इससे पहले भारत-पाकिस्तान के बीच विदेश सचिव स्तर की वार्ता को भारत ने रद्द कर दिया था. उस समय वार्ता में पूर्व भारत में पाक उच्चायुक्त श्री बासित ने कश्मीर के अलगाववादी हुर्रियत के नेताओं गिलानी, मलिक फारुख की मिलने बुलाया और वे गये थे. इस मुलाकातों के विरोध में भारत ने पाकिस्तान की विदेश सचिव स्तर की वार्ता रद्द कर दी थी. अब फिर 23-24 अगस्त को निर्धारित वार्ता से पूर्व श्री सरताज अजीज ने फिर हुर्रियत के नेताओं को बुलाया है. निश्चित ही पाकिस्तान का यही अंदाजा होगा कि पहले की तरह इस बार भी भारत इसी वजह से एन.एस.ए. स्तर की वार्ता भी रद्द कर देगा. इससे यह भी जाहिर होता है कि पाकिस्तान संभवत: यही चाहता है कि यह वार्ता नहीं हो.

हाल ही के दिनों में काश्मीर में पाकिस्तान की और से लगभग रोज ही सीमा की नियंत्रण रेखा पर गोलाबारी हो रही है और कश्मीर में अलगाववादी पाकिस्तान के झंंडे लहरा रहे हैं. हाल ही में जम्मू में पाकिस्तानी आतंकी नावेद भी पकड़ा गया है और इस पर भी कसाब जैसा मामला बनता नजर आ रहा है. पाकिस्तान जानता है कि यदि सिक्युरिटी लेबिल की वार्ता हुई तो भारत यह मसले जरूर उठायेगा और पाकिस्तान के लिए उसके बारे में सफाई देना मुश्किल हो जायेगा. वैसे भी काश्मीर पर भारत-पाक के बीच वार्ता से कुछ तय होता नजर नहीं आता है.
सन् 1948 में आजादी के फौरन बाद विभाजन की पृष्ठभूमि में पाकिस्तान ने यह पाया कि कश्मीर का उत्तरी भाग लद्दाख में बौद्ध धर्मों का प्रचंड है और दक्षिण में जम्मू में हिन्दू बाहुल्य है. बीच की घाटी में मुस्लिम संख्या है इसे धार्मिक विभाजन के आधार पर पाकिस्तान में शामिल किया जाये. लेकिन व्यवस्था के अनुसार राजा हरी सिंह ने अपनी रियासत को भारत में शामिल कर दिया. पाकिस्तान ने कबीले के रूप में आक्रमण कर इस क्षेत्र को विवादित बनाया और भारत ने इसे संयुक्त राष्ट्र को निपटारे को भेजा. वहां निपटारा तो नहीं हुआ और बड़े राष्ट्रों की कूटनीति व दबाव की राजनीति में मामला उलझा पड़ा रहा. संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान से कब्जा हटाने और भारत से वहां जनमत कराने को कहा. पाकिस्तान ने कब्जा नहीं हटाया इसलिये भारत जनमत संग्रह न करा सका. लेकिन उसने वहां चुनाव कराये.

शिमला समझौते में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी और पाकिस्तानी राष्ट्रपति श्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने यह तय किया कि काश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र से वापस ले लिया जाए और दोनों नेताओं ने इसे द्विपक्षीय मामला घोषित किया. युद्ध विराम रेखा को नया नाम नियंत्रण रेखा कहा गया. तब से यह दोनों देशों के बीच का मामला है, लेकिन पाकिस्तान अब फिर यह चाहता है कि इसे इस वार्ता में तीसरा पक्ष शामिल किया जाए. वह इस मामले को संयुक्त राष्ट्र महासभा (जनरल असेम्बली) में उल्लेख करता है. अन्यथा संयुक्त राष्ट्र ने आधिकारिक रूप से पाकिस्तान से यह कह दिया है कि अब यह दोनों देशों का द्विपक्षीय मामला है और उसमें संयुक्त राष्टï्र दखल नहीं देगा. अन्य सभी राष्ट्र भी इसे द्विपक्षीय मामला मानते हैं.

इसलिये हताशा में पाकिस्तान अब इस मामले में तीसरे पक्ष के रूप में कश्मीर के भारत विरोधी हुर्रियत को शामिल करना चाहता है. जबकि शिमला समझौता के अनुसार भारत-पाक वार्ता अब कोई तीसरा पक्ष हो ही नहीं सकता.

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