यह सभी प्रकार की प्रजातंत्रीय अन्य किसी रूपरंग की सरकारों का हमेशा से मूलभूत और आदिकाल यह अधिकार रहा है कि वे राजकाज के लिये कहीं भी किसी की भी निजी जमीन का अधिग्रहण कर सकेंगे और यह हमेशा से होता भी आया है. भारत में जब रेल प्रणाली आई तो उसे बहुत सारी जमीन दी गई थी जिसमें से काफी जमीन आज तक खाली पड़ी हुई है और रेलवे प्रशासन अब यह विचार कर रहा है कि उसका व्यवसायिक कार्यों से अतिरिक्त आमदनी के रूप में दोहन किया जाए. अंग्रेज इस मायने में काफी दूरगामी रहे. उनका विचार था कि इस विशाल भूभाग के देश में रेलों के विस्तार की हमेशा जरूरत पड़ती रहेगी. यदि उससे सटी जमीनें उसके पास नहीं रहीं तो रेल विकास हो ही नहीं पायेगा.

भारत में रेल मुम्बई से प्रारंभ हुई. आज वेस्टर्न रेलवे जो लोकल चर्च गेट तक जाती है वह कभी आगे कोलाबा तक जाती थी. उस समय कोलाबा जंगल था जो आज मुम्बई का सबसे महंगा व पॉश क्षेत्र है. उन दिनों चर्च गेट से कोलाबा तक की रेल इसलिये उखाड़ दी गई कि वहां से सवारी ज्यादा नहीं मिलती थी और वह घाटे का धंधा थी. रेलवे आज भी उसे अपनी सबसे बड़ी ‘बेवकूफीÓ मानती है.
कोलकाता में भूमिगत मेट्रो डालना बहुत महंगा इसलिये पड़ा कि ऊपर जमीन नहीं थी इसलिये सड़कों को खोद नीचे पटरी डाली गयी. कोलकाता का सबसे महंगा इलाका चौरंगी की सड़कें लम्बे अर्से तक खंडहर बनी रहीं.

इस समय यही समझ से परे है कि इस व्यवस्था के रहते नये-नये कानून बनाना, उनका विरोध होना और संशोधन करना क्यों जरूरी समझा गया. इस पूरे खेल की खलनायिका उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती रहीं. नोयडा में अति आधुनिक रोड प्रोजेक्ट ‘यमुना एक्सप्रेसÓ के नाम पर किसानों से ऐसे भूमिग्रहण कानूनी संशोधन के अन्तर्गत जमीन ली गयी कि उन्हें अदालत में जाने का हक ही नहीं था. जमीन ली ‘एक्सप्रेस वेÓ के नाम पर और भारी भ्रष्टïाचार के मुनाफे पर उस अधिग्रहित जमीन को ऊंचे मूल्य के आवासीय टावर बनाने वाले बिल्डर्स को बेच दिया. इसी पर भारी बवाल मचा और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस प्रकार के अधिग्रहण को कानूनी तौर पर अवैध माना और आदेश दिया कि उन पर जो आवासीय टावर बन गये हैं उन्हें तोड़ दिया जाए और किसानों की जमीन लौटायी जाए. किसानों ने पैसे, बिल्डर व शासन के दबाव में आकर बिल्डर्स से सौदेबाजी कर ली. मुआवजा बढ़वा लिया और जमीन बिल्डर्स के पास ही रही.

यूपीए सरकार ने जो भूमि अधिग्रहण कानून बनाया, उसमें यह व्यवस्था रखी गयी कि उसी भूमि का अधिग्रहण होगा जिसके 70 प्रतिशत किसान राजी होंगे. यह धारा ही अपने आप में बहुत ही बेतुकी है. यह शासन जनहित व विकास में तय करता है कि कहां प्रोजेक्ट लगेगा और उसके अनुसार जमीन का अधिग्रहण करता है. यह सहमति की धारा नये संशोधन में नहीं मानी गयी है. इसके रहने से जमीनों पर अधिक मुआवजे के लिये अड़ंगेबाजी की जाती और सहमति भी तभी बन भी जाती जब मुआवजा बढ़ा दिया जाता. इससे भूमि अधिग्रहण का पूरा सिद्धांत ही निराधार हो जाता.

यह नई व्यवस्थाएं जरूर स्वागतयोग्य हैं कि जिस उद्देश्य से जमीन ली जाए, उसी काम में लगे. निजी स्कूल, अस्पतालों के लिए अधिग्रहण नहीं होगा. किसानों को अदालत जाने का हक होगा. विकास करना है तो जमीन चाहिये. जहां जरूरी हो वहीं चाहिए. खेती की जमीन को कम से कम लिया जाए. जमीनों के मूल्यों से भी ज्यादा मुआवजा दिया जाए, तभी लोग स्वेच्छा से आयेंगे. बिल्डर बूम में बिल्डर्स ने पंचायतों व लोगों को रुपया देकर पहले उन्हें खरीदा और बाद में उनकी जमीनें खरीद लीं. विकास में सार्वजनिक हित व जन कल्याण की आड़ में निजी क्षेत्र और भूमि माफिया को दूर ही रखा जाए. विकास व खेती की जमीन के बीच संतुलन नहीं रखा तो फिर से हम अनाज आयात करने वाला देश बन जायेंगे. जिनकी जमीनें ली जाएं उनके साथ नोयडा एक्सप्रेस वे की तरह चालबाजी व धोखाधड़ी
न हो.

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