भूमि अधिग्रहण संपूर्ण विकास खासकर औद्योगिक स्थापनाओं के लिए आधारभूत जरूरत है. इस पर लगातार किसी न किसी प्रकार विवाद बने रहने से विकास और उद्योगों की स्थापनाओं में न सिर्फ प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा बल्कि वह हो ही नहीं पायेगा.

इन दिनों में केन्द्रीय भूमि अधिग्रहण को लेकर राजनैतिक बवाल आया हुआ है. गत यू.पी.ए. के सामने भी भूमि अधिग्रहण की समस्या आयी थी और एक कानून बनाया. अब मोदी सरकार उस कानून में कुछ या मूलभूत परिवर्तन करना चाहती है. इस समय कांग्रेस विपक्ष में है तो निश्चित ही अपने काल में बनाये गये कानून को सही मानेगी और वह संशोधनों का विरोध करेगी. विपक्ष की दूसरी पार्टियां भी इसके विरुद्ध लामबंद हो गयी हैं. अन्ना हजारे भी जो सुसुप्तावस्था स्थिति में चले गये थे इस बार लोकपाल के मुद्दे और आमरण अनशन को छोड़कर भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के विरुद्ध जन्तर-मंतर पर आ डटे हैं, सारे देश में इस पर पद यात्रा करने और उसके बाद जेल भरो आंदोलन चलाने के लिए मैदान में उतर आये हैं. संसद के अन्दर और संसद के बाहर मंचों व सड़कों पर भूमि अधिग्रहण मोदी सरकार के विरुद्ध प्रबल ज्वार का मुद्दा बन गया है.
कानून की परिधि में देश की पूरी जमीन शासन की होती है, लेकिन वास्तविकता में चाहे वह शहरी हो या ग्रामीण, खेती की हो या बंजर भूमि की जरूरत सभी को है. ग्रामीण अंचलों में अधिकांश भूमि किसानों व खेती की है. देश की सबसे बड़ी जरूरत भी खेती और खाद्यान्न उत्पादन ही है. ऐसे में खेती की जमीन का किसी परियोजना, सड़कें, रेल आदि बनाने में यह तो शासन को सुनिश्चित करना ही होगा कि खेती की जमीन तभी ली जाए जब उसका लोकेशन ऐसा हो कि उसे दूसरी जगह संपन्न नहीं किया जा सकता.
मामला चाहे नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर का हो या गंगा में टिहरी बांध का या पश्चिम बंगाल में सिंदूर में टाटा के नेनो कार का कारखाना- जमीन अधिग्रहण को लेकर तीव्र विवाद से विकास को आघात पहुंचा है. नर्मदा परियोजना के इंदिरा गांधी सागर में हरसूद नगर और गंगा पर बने टिहरी बांध से टिहरी नगर डूबे है. किसानों की जमीनें भी डूब में आयी है. पुनर्वास एक बड़ी व जटिल समस्या बना है.
ऐसे में शासन की ऐसी नीतियां होनी चाहिए जो राष्टï्रीय हित में हो और सरकारों में पार्टी शासनों के परिवर्तनों से उसमें परिवर्तन नहीं होने चाहिए. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने टाटा के नेनो कार कारखाना का विरोध इसलिए किया कि उन्हें माक्र्सवादी कम्युनिस्ट शासन राज्य में राजनैतिक दृष्टिï से किसान व खाद्यान्न उत्पादन विरोधी साबित करना था. इस तरह की राजनीति से शासन और विकास नहीं चलाया जा सकता. लेकिन सरकारों को भूमि अधिग्रहण में वह भी नहीं करना चाहिये जैसा उत्तरप्रदेश में बहुजन समाज की मायावती सरकार ने कर डाला. बड़ी सड़कों के ‘एक्सप्रेस वेÓ की योजना के लिए किसानों की जमीन अधिगृहित कर ली और उसे भारी मुनाफे व भारी राजनैतिक रिश्वत से प्रायवेट बिल्डर्स को बेच दिया. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस बिक्री को रद्द कर न सिर्फ किसानों को राहत पहुंचायी बल्कि केन्द्र व राज्य शासनों को भी यह चेतावनी दे डाली कि सरकार के नाम पर कानून की आड़ में इस तरह मनमानी, धोखाधड़ी और भ्रष्टïाचार स्वीकार या बर्दाश्त नहीं किया जायेगा.
लेकिन यहां टाटा की नेनो सिन्दूर आंदोलन की तरह स्थिति नहीं बननी चाहिए कि देशी और विदेशी निवेश तो आ रहा है पर निवेश करने के लिए मूलभूत संरचना जमीन तक उपलब्ध नहीं है इसलिए जैसे टाटा ने सिन्दूर छोड़ दिया उसी तरह निवेशक भी अपना निवेश वापस ले जाएं.
एक बात यह है कि भूमि अधिग्रहण ऐसा हो कि भू-स्वामी को न्यायोचित मुआवजा मिले और जिस उद्देश्य के लिए जमीन ली गयी है उस पर वही काम हो, किसानों से सस्ती जमीन लेकर महंगे दामों पर दूसरे कार्यों के लिए बेचा न जाए. यदि मूल कार्य न हो तो वह जमीन किसान को वापस होनी चाहिये.

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