भारत के संसदीय जनतंत्र में लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव चलते ही रहेंगे. इसलिए इस समय इस बात का विशेष महत्व नहीं है कि इसी वर्ष मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और अगले वर्ष शुरू में लोकसभा के आम चुनाव होने जा रहे हैं. लेकिन इस समय देश में चुनावी माहौल बढ़ता जा रहा है. ऐसे में यह विचार या विवाद कि चुनावों में ई.वी.एम. (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) भरोसे की नहीं है.

इसे जल्द से जल्द हमेशा के लिये तय कर देना चाहिए कि हमारे चुनावों में मशीनों से मतदान होगा या मतपत्र (वैलेट पेपर) से पहले की तरह यथावत् किया जाये.

कई वर्षों पूर्व भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी ने यह प्रश्न सबसे पहले उठाया कि कई विकसित यूरोपीय देशों में मशीनों से वोटिंग कराना खत्म कर फिर से पेपर वोटिंग शुरू कर दी गयी है, क्योंकि उन्होंने मशीनों को सही और भरोसे की नहीं पाया. उन्होंने यह बात भारत में किसी चुनाव संदर्भ में नहीं कही थी यह एक सामान्य विचार था.

लेकिन सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में देश में खास कर उत्तर प्रदेश मेंं भारतीय जनता पार्टी की भारी विजय हुई. चुनावों से पूर्व ही देश में यह अहसास होने लगा था कि भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आने जा रही है. इस चुनाव में उत्तरप्रदेश में मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी जीरो हो गयी- एक भी सदस्य लोकसभा के लिये नहीं जीता.

इस हार से हाल बेहाल मायावती ने अपनी चुनावी दुर्दशा को इस आड़ में छुपाया कि उन्हें भारतीय जनता पार्टी ने नहीं बल्कि ई.वी.एम. मशीनों की हेराफेरी (टेम्परिंग) से हराया है. प्रतिक्रिया में सभी ने यह माना कि ई.वी.एम. मशीनों पर दोषारोपण कर मायावती अपनी हार की झेंप मिटा रही हैं.

इसके बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव आये और इसमें भी भारतीय जनता पार्टी प्रचंड बहुमत से जीत हासिल कर राज्य सरकार भी बना डाली. इसमें समाजवादी पार्टी ने भाजपा के हाथों सत्ता हारी थी. मुख्यमंत्री रहे श्री अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी की हार को भी ई.वी.एम. में कथित गड़बड़ी बताकर अपनी तसल्ली की.

हाल ही में गोरखपुर व फूलपुर के उपचुनावों में समाजवादी पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी को जबरदस्त शिकस्त देकर भारी बहुमत से दोनों उपचुनाव जीते. इस बार अपनी बात को जमाये रखने के लिए यह कहा कि यदि मशीनें न होती तो उनकी पार्टी की जीत और ज्यादा मतों से होती.

हाल ही में दिल्ली में कांग्रेस का महाअधिवेशन हुआ. इसमें पार्टी अध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने कांग्रेस की तरफ से यह मांग कर दी कि चुनावों में वैलेट पेपर पद्धति को लौटा जाना चाहिए. इस पर अब भारतीय जनता पार्टी की ओर से श्री राम माधव ने यह कहा है कि यदि सभी दलों में आम सहमति बन जाए तो ई.वी.एम. की जगह फिर से वैलेट पेपर प्रणाली को लाने पर विचार किया जा सकता है.

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त श्री टी.एन. शेषन ने भारत के चुनावों को इतना निष्पक्ष बना दिया कि मतदान केंद्रों पर कब्जा करने का अपराध ही खत्म हो गया. चुनाव खर्र्चों पर रोक लगी और उन्हें ने कई चुनावों में और गतिशीलता लाने के लिये इन चुनावों में ई.वी.एम. वोटिंग प्रणाली शुरू की थी.

जो अच्छी खासी चल रही थी लेकिन 2014 के चुनावों से यह सिलसिला चल पड़ा कि जो हारता है वह अपनी हार की वजह ई.वी.एम. में गड़बड़ी को बताता है. जबकि दिल्ली के चुनावों में मोदी सरकार के आने के बाद भी केजरीवाल की ’आप’ पार्टी कुल 70 में से 67 सीटें जीती थीं. अभी गोरखपुर व फूलपुर में भी भाजपा की करारी हार हुई.

विवाद प्रारंभ होने पर भारत के चुनाव आयोग ई.वी.एम. मशीनों को खुले रूप से पार्टियों की जांच पड़ताल पर रख दिया लेकिन उससे न जाने राजनैतिक दल दूर रहे और वजह भी यह समझ में आयी की उनके पास ऐसा कुछ नहीं था जिसमें वे इन मशीनों में टेम्परिंग हो जाना साबित कर सके. चुनाव आयोग आज भी यह कह रहा है कि ये मशीनें टेम्पर प्रूफ और उचित है.

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