मोदी सरकार यू.पी.ए. सरकार की स्वतंत्र भारत की अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक, सामाजिक व ट्रेड यूनियन की योजना का काम परिवर्तन करके काम तमाम (खात्मा) करने जा रही है. नाम तो संभवत: मनरेगा ही रहेगा पर इतना अन्दरुनी ढांचा, रूप व कार्य परिवर्तन के नाम से खत्म हो जायेगा. शब्द ‘परिवर्तनÓ का अर्थ होता है कि जो है उसे और उन्नत किया जाए. लेकिन जब किसी अन्य भावना से केवल परिवर्तन के लिये परिवर्तन किया जाए तो वह परिवर्तन होता ही नहीं है. मनरेगा में ऐसे ही परिवर्तन की घोषणा प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने बंगरुलू में की है.

यह यथार्थ है कि भारत गांवों में बसता है और देश में दारिद्रय गांवों में ही है. वे सदियों तक नये ज्ञान व तकनीक से दूर रहे. खेतीहर मजदूर देश का सबसे ज्यादा असंगठित गरीब और सबसे कम काम व मजदूरी का होता था. उसकी झोपड़ी में भुखमरी का स्थाई वास होता था. यू.पी.ए. सरकार ने ग्रामीण रोजगार गारंटी की योजना ‘नरेगाÓ जो अब ‘मनरेगाÓ कहलाती है देश में शांत क्रांति (साइलेंट रिवूलूशन) कर दिया. गांव के पास ही 5-10 किलोमीटर की परिधि में साल में 100 दिन काम व दाम की गारंटी दे दी. 15 दिन में काम नहीं तो बेकारी का भत्ता. काम मजदूरों के हाथों में गैती, फावड़ा व तगाड़ी से होगा. कोई मशीन नहीं चलेगी और ठेकेदारी काम नहीं होगा. पूरी सरकार के फंड व निगरानी का काम है.

इसे सारी दुनिया में रोजगार की सबसे बड़ी योजना के रूप में गिनीज बुक रिकार्ड में दर्ज किया. बड़े से बड़ा ट्रेड यूनियन संगठन या नेता भी भारत भर में ग्रामीण अंचलों में बिखरे इतने मजदूरों को संगठित नहीं कर सकता था. इतनी बड़ी मजदूरी और काम नहीं मिल सकता था. वह यू.पी.ए. सरकार ने एक योजना से भारत के ग्रामीण अंचलों में ऐसी आर्थिक क्रांति ला दी वो सब संगठित और इतनी मजदूरी पाने लगे कि जिनकी कभी उन्होंने कल्पना तक नहीं की.

इसकी क्रांति और सफलता का गिनीज रिकार्ड से कहीं ज्यादा बड़ा सर्टिफिकेट यह है कि गांवों के बड़े किसानों को यह शिकायत हुई कि नरेगा-मनरेगा की वजह से उन्हें खेती के लिये मजदूर नहीं मिल रहे और उन्हें मजबूर होकर बिना किसी ट्रेड यूनियन आंदोलन के स्वत: ही मनरेगा से ज्यादा मजदूरी देना पड़ी. मनरेगा ने एक झटके में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का दारिद्रता का कलंक खेतीहर मजदूर को संपन्न व सुखी मजदूर बना दिया.

प्रधानमंत्री श्री मोदी का यह कथन कि मनरेगा को गड्ढïे खोदने के लिए पैसे बरबादी का जरिया नहीं होना चाहिए. मनरेगा की पहली प्राथमिकता नहरें, तालाब व चेक डेम बनाने की होगी.

अभी तक मनरेगा का काम गांव की 5-10 किलोमीटर की परिधि में होता है. लेकिन नहरें, तालाब व चेकडेम तो हर जगह नहीं होते. नहरें तो बड़े बांधों पर तालाबों से ही निकलती हैं. ये बड़े काम केवल मजदूर, गेंती, फावड़े व तगाड़ी से नहीं हो सकता. यहां मशीनें भी चलेंगी और ठेकेदारी-टेंडरबाजी भी होगी. यह तो अभी भी ऐसे कामों में होता ही आ रहा है. इसमें मोदी कौन सी नई विधा प्रस्तुत कर रहे हैं. यह जरूर होगा कि मनरेगा जो अभी ग्रामीण परिवेश की है वह अब ग्रामीण नहीं रहेगी.

गांवों में फिर से खेतिहर मजदूर व दारिद्रय आ जायेगा और मजदूरों का शहरों की ओर पलायन और झुग्गी-गंदी बस्तियों का वास होगा.

मोदी सरकार के आते ही ऐसा आभास हुआ था कि वह मनरेगा खत्म करना चाहती है. कांग्रेस इस मामले में बहुत संवेदनशील हो गयी है. इसलिए मामला उस समय टाल दिया गया लेकिन अब नाम वही पर काम पुराने ढर्रे का बना उसे खत्म किया जा रहा है. मोदी सरकार ‘नाम बदलो- काम बदलोÓ की अनैतिक राजनीति कर रहे हैं. उसे नया काम नये नाम करने की नीति
अपनाना चाहिए.