चार साल पहले कांग्रेस नेतृत्व की यू.पी.ए. सरकार ने महात्मा गांधी राष्टï्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी एक्ट से मनरेगा नाम की जो योजना शुरू की थी उसे लागू होते ही दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार योजना की ख्याति मिली. अपने आप श्रम क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया कि गांवों का खेतिहर मजदूर जो सबसे कम मजदूरी पाने वाला और असंगठित मजदूर वर्ग था वह उन्नत मजदूरी पाने वाला संगठित मजदूर वर्ग बन गया.

सरकार की इस नीति के मूल में सूखा, बाढ़ जैसी स्थिति में हमेशा से चलाये जाते रहे ‘राहत कार्यÓ की भूमिका व विचार रहा. मनरेगा से इसे स्थाई रूप दिया गया. राहत कार्य भी ग्रामीण क्षेत्र में चलते थे और उनमें भारी भ्रष्टïाचार होता था. फर्जी मस्टर रोल बनाकर राहत का रुपया भ्रष्टïाचार में डूबता ही था. प्रारंभ में यही खामी मनरेगा कामों में भी आयी. फर्जी जाब कार्ड बनाये. कार्यक्रम की सीमा यह है कि इसमें मजदूर हाथों मेंं गैती, फावड़ा व तगाड़ी से काम करेगा. ठेकेदारी नहीं होगी. मशीनों से काम नहीं होगा. लेकिन यह भी प्रकरण सामने आये कि ग्रामीण क्षेत्र में ठेकेदारों व मशीनों से काम कर लिया और इसे मनरेगा काम बताकर फंड की अफरा तफरी की गयी. मजदूरों का भुगतान भी रोका गया.

इसका एक सशक्त नियम बनाया गया कि हर राज्य मनरेगा कार्यों का सोशल आडिट करेगा कि काम कैसा हुआ और फंड कैसे खर्च किया गया. इसके साथ ही दूरदर्शन व टेलीविजन पर सरकारी विज्ञापनों में लगातार जोर-शोर से प्रचार किया गया कि अब मनरेगा में मजदूरों को बैंक या पोस्ट आफिस से 15 दिन के अन्दर मजदूरी दी जा रही है. 15 दिन में काम न देने पर बेरोजगारी भत्ता दिया जा रहा है और हर काम का सोशल आडिट हो रहा है.

लेकिन अब भारत सरकार के नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक (कैग) ने जो रिपोर्ट पेश की है उससे तो यह आशंका हो रही है कि दुनिया की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार गारन्टी योजना मनरेगा में भारी घपला, घोटाला और भ्रष्टïाचार हुआ है. काम होने के प्रचार के पीछे कुछ काम नहीं हुआ और भारी-भरकम फंड की अफरा-तफरी की गयी है. इसमें मंत्री, राजनैतिक नेता व उच्च अधिकारी लिप्त हैं.
मध्यप्रदेश सहित आंध्र, असम, गुजरात, हरियाणा, जम्मू-काश्मीर, झारखंड, महाराष्टï्र, ओड़ीसा, पंजाब, तेलंगाना, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल में कोई आडिट नहीं हुआ. जबकि मनरेगा एक्ट में यह प्रावधान है कि सोशल आडिट के लिये सरकारी नियंत्रण से बाहर स्वतंत्र आडिट संस्थान बनेगा. इसका कार्य निर्धारित किया गया कि सोशल आडिट से कामों का होना या न होना सामने आयेगा- फंड का खर्च का आडिट होगा और इससे मनरेगा मजदूरों की परेशानियों की सुनवाई व निराकरण होगा.

पुराने चलन के राहत कार्यों में जो स्थानीय अधिकारी व कर्मचारी अफरा-तफरी करते थे. लेकिन मनरेगा में राज्य सरकारों ने ही आडिट को टाल दिया. इससे लगता है कि मंत्री, नेता व उच्च अधिकारी स्तर और राज्य स्तर का भ्रष्टाचार हुआ है. मनरेगा का भारी-भरकम फंड हाई प्रोफाइल भ्रष्टïाचार में चला गया है. भारत सरकार अब केन्द्रीय स्तर पर हर राज्य के लिये अलग से आडिट टीमें बनायेें और पूरी मनरेगा स्कीम का प्रारंभ से आज तक सोशल आडिट
किया जाए.

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