चेन्नई. मध्य प्रदेश ने बौद्घिक संपदा अपीलीय बोर्ड (आईपीएबी) से मांग की है कि उसके दावे को उन राज्यों के समान देखा जाना चाहिए जिन्हें कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) द्वारा बासमती चावल के लिए जीआई टैग के पंजीकरण का सुझाव दिया गया है.

राज्य ने यह तर्क ऐसे समय में पेश किया है जब आईपीएबी में बुधवार को संबद्घ मामलों की सुनवाई हुई है. अपीडा और कई अन्य पक्षों ने जीआई रजिस्ट्री के आदेश के संबंध में अपीलीय बोर्ड में अपील की. इसमें निर्यातकों की संस्था से मध्य प्रदेश को भी बासमती चावल के लिए जीआई टैग के दावे के तहत शामिल कर जीआई आवेदन पुन: सौंपने को कहा गया. बुधवार को लगातार दूसरे दिन इस मामले पर सुनवाई हुई तो राज्य सरकार के वकील ने तर्क दिया कि राज्य कई दशकों से खास तरह के चावल का उत्पादन कर रहा है और हजारों किसान इसकी खेती से जुड़े हुए हैं. साथ ही एपीडा ने तर्क पेश किया कि मध्य प्रदेश ऐसा राज्य नहीं है जो गंगा नदी के क्षेत्र में आता हो जहां चावल की खेती पारंपरिक तौर पर की जाती है. उसने यह भी कहा कि राज्य यह दावा करता है कि वहां पैदा हुए चावल में बासमती की विशेषताएं हैं, लेकिन राज्य में तापमान पारंपरिक रूप से बासमती उत्पादक राज्यों की तुलना में अलग है और इसलिए इसे जीआई के तहत शामिल नहीं किया जा सकेगा.

एपीडा ने शुरू में मध्य प्रदेश के जीआई टैग के दायरे में शामिल किए बगैर जियोग्राफिकल इंडिकेशंस ऑफ गुड्ïस (रजिस्ट्रेशन ऐंड प्रोटेक्शन) ऐक्ट, 1999 के तहत धारा 30 में बासमती के पंजीकरण के लिए आवेदन किया था. विवाद तब गहरा गया जब एपीडा ने पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर को बासमती चावल का नाम पंजीकृत कराने के लिए जीआई रजिस्ट्री के पास आवेदन किया था जबकि मध्य प्रदेश को इसके दायरे में नहीं रखा गया.

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