रिजर्व बैंक के गवर्नर श्री रघुराम राजन ने द्विमाही मौद्रिक समीक्षा में बैंकों की नीतिगत ब्याज दरों- रेपो- रिवर्स रेपो- सी.आर.आर. को यथावत् 6.50-6 और 4 प्रतिशत पर कायम रखा. श्री राजन ने अपनी विवेचना में कहा कि अभी मूल्यवृद्धि की प्रवृत्ति (इन्फ्लेमेशनरी टेन्डेन्सी) कायम है, इसलिए बैंक ने ‘रुको और देखो’ की नीति अपनायी है. इस साल अच्छी वर्षा के संकेत मिले हैं.

श्री राजन के विश्लेषण में स्थिति का आंकलन में पिछले दो सालों से मानसून की प्रवृत्ति को ध्यान में रखा गया है. भारत में पिछले दो सालों मेें व्यापक पैमाने पर सूखा तो नहीं था लेकिन अल्प वर्षा रही जिससे उत्पादन काफी हद तक प्रभावित भी हुआ और सम्हाला भी गया. लेकिन एक ऐसे अल्पवर्षा के साल में यह भी हो गया कि जब फसल पक कर कटने पर रही थी उसी समय वर्षा और औले गिर गये. ऐसी बरसात को किसान ‘बर्बादी’ की वर्षा उसी तर्ज पर कहते है जैसे ठंड में ‘मावठा’ की वर्षा को खेतों में सोना बरसना कहते है.

इस बार यह तो अनुमान है कि वर्षा अल्प न होकर अधिक होगी और 106 से 113 प्रतिशत हो सकती है. पर खेती को क्रम के अनुसार वर्षा और खुले दिन समय पर चाहिए. लंबे समय तक खेतों में कीचड़ न रहे और खुले दिनों में ज्यादा लंबा अंतराल भी न रहे. इस साल के अनुमान के अनुसार यदि देश ने अभी से जल संग्रहण की तालाब, कुओं व वाटर हार्वेस्टिंग में कर ली तो गत दो सालों में जो भूजल की कमी आ चुकी है उसे भरा जा सकता है. खेती का उत्पादन इस पर निर्भर करेगा कि वर्षा क्या-क्या रूप दिखाये. दालों की अत्याधिक महंगाई ने देश में सभी खाद्यान्नों पर मूल्यों पर दबाव बनाए रखा.

मोदी सरकार के गत दो साल के कार्यकाल में प्राकृतिक कारणों के अलावा मूल्य वृद्धि का एक बड़ा कारण विकास सेवाओं के नाम पर सभी वस्तुओं पर तीन बार सर्विस टैक्स बढ़ाते जाना भी है. देश में किसी भी वस्तु के दाम नीचे नहीं आये. इससे जनता पर 60 प्रतिशत आर्थिक भार बढ़ गया है. विदेशों से काला धन लाने व मूल्य वृद्धि के नाम पर ही मोदी सरकार सत्ता में आई और उन्हीं दो मोर्चों पर वह वादों पर खरी नहीं उतरी बल्कि और विपरीत हो गयी.

अप्रैल में देश में रिटेल मुद्रास्फीति बढ़कर 5.39 प्रतिशत तक पहुंच गयी. रिजर्व बैंक मानसून की स्थिति पर नजर रखेगा. जैसा कि अधिक वर्षा का आंकलन हो रहा है तो ऐसा भी नहीं होता कि मानसून आते ही सभी कुछ सामान्य हो जाए. वर्षा का लाभ रबी फसलों की कटाई तक आंका जाता है. दालों के भावों में कुछ गिरावट के बाद फिर से तेजी आने लगी है. एन.पी.ए. बढऩे से बैंकों की हालत भी काफी खराब हो गयी है. वर्ष 16-17 में कुल 18 हजार रुपयों का घाटा हुआ है. बजट में बैंकों को पूंजी प्रदाय करने के लिए 25 हजार करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया है. लेकिन यह स्थिति भी बनी हुई है कि बैंकों को उसी अवधि में एक लाख 40 करोड़ रुपयों का फायदा भी हुआ है.

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