जब डीजल और पेट्रोल के दाम लगातार गिर रहे हैं उससे यही अपेक्षा की जा रही है कि मालभाड़ा और यात्रा किराया की दरें घटने से सभी माल की कीमतें भी घटेंगी. फरवरी-मार्च में रबी की फसलें गेहूं, चना आना शुरु हो जाता है और उससे पहले सरकार व व्यापारी अपना पिछला खाद्यान्न का स्टाक बाजार में उतार देते हैं, उससे भी भाव काफी नीचे आते हैं. शीतकाल उतार पर आने लगता है इस समय फल-सब्जियों की आवक बहुतायत में रहने से भाव नीचे रहते हैं. लेकिन इस समय भावों का बढऩा अर्थ-व्यवस्था की कमजोरी दर्शा रहा है.

रिटेल में कीमतें जनवरी में बढ़कर 5.11 प्रतिशत हो गई जबकि दिसम्बरें 14 में 4.28 प्रतिशत थी. गत माह जनवरी में खाने-पीने की चीजों के भाव 6.13 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में हो गये और ग्रामीण क्षेत्रों में महंगाई 4.16 से बढ़कर 5.25 प्रतिशत हो गयी. सब्जियों के भाव में 9 प्रतिशत की वृद्धि आ गई. औद्योगिक उत्पादनों में आई.आई.पी. ग्रोथ रेट घटकर 1.7 प्रतिशत रह गयी.

केन्द्र सरकार ने जो महंगाई के आंकड़े जारी किये हैं उसमें न सिर्फ खाद्य महंगाई व स्वास्थ्य, शिक्षा और मनोरंजन जैसे सेवा क्षेत्रों में भी महंगाई बढ़ गई है. फलों की कीमतों में 10.62, दूध में 9.38 और दालों के भाव 9.37 प्रतिशत बढ़ गये हैं. सब्जियों के बारे में जहां यह आंकड़े आते हैं कि वह 9 प्रतिशत बढ़ी है, वहीं एक विरोधाभासी खबर सब्जियों में सबसे ज्यादा खपत वाले आलुओं के भाव गिर रहे हैं. उत्तर भारत की मंडियों में पिछले 15 दिनों से आलू के भाव 600 रुपये से घटकर 400 रुपये प्रति क्विंटल रह गये, जबकि आलू की बुवाई के समय इसके भाव 1600 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गये थे और किसान आलू की खेती की तरफ ज्यादा झुक गया था. इसका एक बड़ा कारण आलू निर्यात पर रोक भी माना जा रहा है. भारत पाकिस्तान को सबसे ज्यादा आलू निर्यात करता है. आलू किसानों को 30,000 रुपये प्रति एकड़ का घाटा हो सकता है.

अन्तरराष्टï्रीय स्तर पर इस समय भारत का विदेशी मुद्रा का भंडार सर्वकालिक उच्चतम शिखर 330 अरब डालर पर पहुंच गया है. इसका एक बड़ा कारण इन दिनों क्रूड ऑइल के भावों में तेजी से सार्वकालिक भावों में कमी आना है. इनके भाव इतने ज्यादा गिर गये कि भारत में केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों को इससे प्राप्त होने वाली टैक्स आमदनी में भारी कमी आ गयी. जिसे इन सरकारों ने एक्साइज ड्यूटी, एन्ट्री टैक्स वेट टैक्स दरों को बढ़ाकर कर ली. लेकिन इसमें एक अनैतिकता भी आ गयी कि सरकार ने इनके भावों को बाजार भावों के उतार-चढ़ाव से जोड़कर उसे शासकीय नियंत्रण से मुक्त कर दिया था, लेकिन जब भाव बढ़े तो सरकारें उसका लाभ लेती रहीं और भाव गिरने पर उसे आम लोगों व अर्थ व्यवस्था में नहीं आने दिया. इसी का परिणाम यह है कि इस समय जबकि भावों के बढऩे का और औद्योगिक क्षेत्र शिथिल होने का कोई कारण नहीं उस समय यह खबर आ गयी कि खाद्यान्नों के मूल्य बढ़ गये और इसकी वजह से मुद्रास्फीति भी बढ़ गयी.

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