भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा है कि अगले वित्तीय वर्ष 2016-17 में महंगाई 10 प्रतिशत तक बढऩे की आशंका है. जबकि अभी तक रिजर्व बैंक का अनुमान था कि महंगाई 5 प्रतिशत तक बढ़ेगी- यह उस अनुमान से दुगनी है. बैंक को यह निराशावादी अनुमान उसके सर्वे ‘इन्फ्लेशन एक्सपेक्टेशंस आफ हाऊस होल्डÓ में आया है.

रिजर्व बैंक अपनी बैंक दरों को एक लम्बे अर्से से खाद्यान्नों की मूल्यवृद्धि और बढ़ती हुई मुद्रास्फीति से तय करता है. अपनी इसी फरवरी माह की मौद्रिक समीक्षा में बैंक ने कहा कि अभी मूल्यवृद्धि और मुद्रास्फीति जिस स्तर पर चल रहे हैं उसमें बैंक दरों को कम नहीं किया जा सकता. जबकि अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिये ब्याज दरों में कटौती जरूरी है. विश्व के विकसित राष्टï्रों में बैंक ब्याज दरें 2-3 प्रतिशत पर चल रही हैं और जापान तो इस हद तक चला गया कि उसने अपनी बैंक दरों को निगेटिव कर दिया जिससे लोग अपना धन बैंकों में रखने की बजाय अर्थव्यवस्था में निवेश करे.

जहां तक महंगाई बढऩे का सवाल है तो केन्द्र व राज्य सरकारें स्वयं ही महंगाई बढ़ाती जा रही हैं. स्वच्छ भारत के नाम पर सभी वस्तुओं पर सर्विस टैक्स बढ़ा दिया. वित्तीय घाटा की भरपायी के लिये जनता से वादाखिलाफी व विश्वासघात करते हुए पेट्रोल-डीजल पर लगातार केन्द्र द्वारा एक्साइज ड्यूटी और राज्यों द्वारा एन्ट्री टैक्स व वेट टैक्स की दरें बढ़ाकर लगातार सस्ते होते जा रहे पेट्रो क्रूड का लाभ आम जनता व उद्योग व्यापार जगत को नहीं देना चाहते. जबकि टैक्सों का भार भी गिरते हुए क्रूड के भावों के अनुपात में ही कम होना चाहिए. यदि ऐसा किया जाता तो पेट्रो क्रूड के भाव रिकार्ड गिरावट से 27 डालर तक गिर गये थे.

यदि इसी अनुपात में पेट्रोल-डीजल के भाव भी घटाये जाते तो इस समय देश में माल ढुलाई की ट्रान्सपोर्ट दरें भी रिकार्ड गिरावट में कम हो जाती और सभी वस्तुओं के भाव भी काफी गिर जाने से महंगाई व मुद्रास्फीति दोनों ही रिकार्ड स्तर पर कम हो जाती. इसका परिणाम यह भी होता कि रिजïर्व बैंक जो महंगाई मूल्यवृद्धि पर ब्याज दरों को आधारित किये बैठा है, वह भी ब्याज दरें घटा देता और उद्योग-व्यापार जगत में निवेश बढ़ जाता.

खाद्य सुरक्षा कानून की बात भी हो रही है और दालें 30-35 रुपये किलो से बढ़कर 200 रुपये किलो तक चल रही हैं. अब यह भी जांच से पता चला कि दाल के आयातकों ने दालों के स्टाक की देश से बाहर कनाडा और खाड़ी देश कतर में ही होर्डिग कर देश में कृत्रिम अभाव पैदा कर दालों को इस ऊंचाई तक पहुंचा दिया. इसमें राजनैतिक व सरकारी भ्रष्टाचार का भी अंदेशा हो रहा है. दालों के भाव पूरी तौर पर सट्टा व जमाखोरी के कारण ही जानबूझ कर भारी अभाव से भारी कमाई करने के लिये किये गये.

अब यदि भाव कुछ कम हो जाते हैं तो उन्हें उस वक्त तक कम होना नहीं कहा जा सकता जब तक वे उस स्तर पर न पहुंच जाए जहां से उनका बढऩा शुरु हुआ है. यदि सरकारें आपूर्ति प्रबंधन (सप्लाई मैनेजमेंट) को इस प्रकार कर ले कि जमाखोरी, सट्टïा न होने पाये और समय से पहले ही दालों, खाद्य तेल आदि का आयात हो जाए तो भाव व मुद्रास्फीति बढ़ ही नहीं सकती. यथार्थ यह है कि महंगाई बढ़ नहीं रही है- सरकारें महंगाई बढ़ा रही हैं.

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