रिजर्व बैंक के गवर्नर श्री रघुराम राजन चेतावनी दी है कि जिस तरह दुनिया को 1930 की आर्थिक महामंदी का सामना करना पड़ा था उसी तरह के हालात फिर से पैदा हो रहे हैं. ग्रीस के आर्थिक दिवालियेपन ने सारे यूरो यूनियन के यूरोजोन के राष्टï्रों को झकझौर के रख दिया है. श्री राजन ने कहा है कि हम वैश्विक मंदी की तरह बढ़ रहे है और केंद्रीय बैंकों द्वारा वैश्विक नियम बनाने के लिये जोर देना चाहिए.

एक अर्से के बाद श्री राजन ने इस स्थिति को स्वीकार किया है कि रिजर्व बैंक को निवेश को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ब्याज दरों में और गिरावट करना जरूरी है. दुनिया के शीर्ष बैंकों के प्रतियोगी मौद्रिक नीति को आसान बनाना भी जरूरी हो गया है. चीन ने हाल ही के वर्षों में 4 बार अपनी पूंजी दरों में ब्याज का रेट घटाया है. जबकि भारत में बैंक ब्याज दरें लगातार बढ़ाते रहे है. भारत में अभी भी निवेश को बढ़ाने की जरूरत है. विश्व की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित व सुगम रखने के लिये सभी देशों के शीर्ष बैंकों पर दबाव बढ़ाना सकारात्मक कदम होगा.
समस्या केवल विकसित और विकासशील देशों तक सीमित नहीं है. सभी देशों में ग्रोथ रेट बढ़ाने के लिये केंद्रीय बैंकों पर दबाव बना हुआ है. वर्तमान आर्थिक संकट से उबरने के लिये दुनिया के सभी आर्थिक संस्थानों को नये उपाय तलाशने होंगे. ग्रोथ की रफ्तार बढ़ाने के चक्कर में हम 1930 के दशक जैसी समस्याओं में घिरते जा रहे हैं. पिछले 4 सालों में दुनिया का सकल घरेलू उत्पाद 15 प्रतिशत घट गया और विश्व व्यापार में 50 प्रतिशत की गिरावट आयी हुई है.

विश्व के विकसित देशों को सस्ते कर्ज की होड़ और दुनिया की सभी अर्थव्यवस्थाओं को मुद्रा प्रवाह से बचना चाहिए. इस समय दुनिया में भारत के हालात अलग हैं. यहां निवेश बढ़ाने की जरूरत है. ब्याज दरों में कमी की जाए ताकि कम्पनियों को सस्ते दर पर कर्ज मिले और वह निवेश कर सके.
दुनिया की अर्थ-व्यवस्थाओं को बेहतर समाधान के उपाय तलाशने होंगे. इस बात को निर्धारित करने का समय आ गया है कि नये नियम क्या होने चाहिए.
इस समय भारतीय बैंकों में लोगों द्वारा लिये गये कर्जों की अदायगी में तो रुकावट आ गयी है और बैंकों पर चलन (सरकूलेशन) के लिये पूंजी की भारी कमी है. वैसे अभी बैंकों के पास काफी पूंजी है लेकिन वैश्विक मानकों के पालन के लिये उन्हें और पून्जी की जरूरत होगी. इस साल बजट में बैंकों को पून्जी देने के लिये 7,940 करोड़ रुपये रखे
गये हैं.

पिछले साल इन्हें 6,990 करोड़ रुपयों का पून्जी सपोर्ट दिया गया था. बीते चार साल में सरकार बैंकों को 58,634 करोड़ रुपये दे चुकी है और 2018 तक इन्हें 2.4 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होगी.

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