देश में अब जातीय आधार पर सरकारी नौकरियों, शिक्षा के क्षेत्र में व अन्य प्रकार आर्थिक लाभ पाने के लिये आरक्षण अब ‘महा’ आरक्षण बन गया है. मुसलमान धर्म के आधार पर आरक्षण मांग रहे हैं. जातियों में भी अनेकों उप-
जातियां हैं.

सामाजिक क्षेत्र में अभी तक यह शान की बात होती रही कि वे लोग अपने को दूसरों से ज्यादा संपन्न और उन्नत बताएं. लेकिन अब होड़ इसमें हो गयी है कि वे लोग अब अपने को दूसरों से पिछड़ा व गरीब बता रहे हैं. इसके लिए उग्र आंदोलन हो रहे हैं. देश में जितनी जातियां और धर्म हैं आगे चलकर सभी आरक्षण मांगने जा रही है.

अभी तक आरक्षण मांगने का आधार पिछड़ापन रहा. अब एक आधार यह और हो गया है कि आरक्षित जातियों की बढ़ती संख्या के कारण बाकी बची जातियों को अवसर नहीं मिल रहे हैं. इसलिए उन्हें भी आरक्षण दिया जाए. अब यही आधार मुख्य आधार बनता जा रहा है. इसके आधार पर यदि हर जाति का आरक्षण कोटा बनाया जाए तो वह असंभव होगा. देश में इतनी जातियां उनकी उपजातियां और धर्म है कि 100 प्रतिशत आधार को विभाजित ही नहीं किया जा सकेगा. एक-एक प्रतिशत आरक्षण भी नहीं दिया जायेगा. वह भी बहुत ही कम पड़ जायेगा. इसका नतीजा यह होगा कि जैसे बिजली और फोन टावरों पर लोड बढ़ जाने से वह ‘क्रेशÓ हो जाती है उसी तरह आरक्षण भी आगे चलकर और शीघ्र ही ‘क्रेशÓ होने जा रहा है. देश में गहरे असंतोष और उग्र आंदोलनों से पूरी संवैधानिक व शासन व्यवस्था के ही ‘क्रेशÓ हो जाने की आशंका है. अभी तक देश में जनसंख्या की सामान्य गणना होती थी उसे भी जातीय आधार की जनसंख्या बनाने से अब एक और होड़ अपनी-अपनी आबादी बढ़ाने में होने जा रही है.

आरक्षण के मामले में पूरा भस्मासुरी संकट इसलिए आ गया है कि जनमोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपनी संकट से घिरी गिरती हुई सरकार को बचाने के लिये संविधान में निहित आरक्षण नीति, विचार व फार्मूले का उल्लंघन कर दिया. उसका मूल विचार व मूल आधार ही खत्म हो गया. डॉक्टर अम्बेडकर ने वनवासी आदिवासियों व दो निम्न स्तर की अछूत मानी गई जातियों के लिये आरक्षण की व्यवस्था की थी. वी.पी. सिंह ने मंडल कमीशन के नाम पर उसमें अन्य पिछड़ी जातियों के नाम पर अनेकों जातियों को भर उन्हें ओ.बी.सी. (अदर बेकवर्ड क्लासिस) के नाम पर 27 प्रतिशत आरक्षण दे दिया. अब यह आरक्षण नौकरियों में पदोन्नतियों में भी लागू कर दिया गया है.
पिछले 2-3 वर्षों में राजस्थान के गुर्जरों ने भी ‘पिछड़ाÓ के नाम पर आरक्षण के नाम पर ऐसा उग्र और हिंसक आंदोलन चलाया कि महीनों मुम्बई सेंट्रल-दिल्ली रेल खंड पर रेल यातायात ठप्प रहा और सरकारें खामोश बैठी रहीं. यह रवैया साफ तौर पर उन्हें प्रोत्साहन देने वाला था. उन्होंने दुबारा वैसा ही ‘रेल ठप्पÓ आंदोलन चलाया और सरकार ने उन्हें पिछड़ा मान 5 प्रतिशत आरक्षण दे दिया.
इससे अब यह सभी जातियों को खुला निमंत्रण हो गया कि आओ- खूब हिंसा करो और आरक्षण पाओ. एक वी.पी. सिंह का अभिशाप था और दूसरा यह यू.पी.ए. और एन.डी.ए. सरकारों का अभिशाप है.

गुजरात के पाटीदार (पटेल) जो अब तक आरक्षण नीति का घोर विरोध कर रहे थे वे भी अब आगे आ गये हैं और उनके साथ कुर्मी, कोली व अन्य जातियां भी जुड़ गई हैं कि ‘लाओ- हमें भी दो आरक्षण.Ó वी.पी. सिंह के समय भी देश में आरक्षण पर ही भारी हिंसा भड़की थी. अब सारा देश आरक्षण की आग में झुलसने जा रहा है. अब दलित भी अपनी रक्षा में आगे आ गये हैं कि अन्य जातियों को आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए. इस गहन समस्या का एक मात्र उपाय यह है कि डाक्टर अम्बेडकर फार्मूले पर लौटा जाए और ओ.बी.सी. आरक्षण पूर्ण रूप से खत्म हो.

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