भारत सरकार की राष्टï्रीय महत्व व गौरव की महा सड़क (मेगा) योजना में 17 सालों की महा देरी हो चुकी है और अब यह तय किया जा रहा है कि इन दो महा सड़कों की क्रियान्वयन प्रक्रिया को प्रारंभ किया जाए. यह गति है हमारे विकास की है. जहां यह ढर्रा हो वहां दुर्गति ही प्राप्त होगी. हमारे देश के विकास को अवरोधित करने में जहां शासकीय प्रशासकीय भ्रष्टाचार बहुत बड़ा मुद्दा है वही योजनाओं में वर्षों व दशकों की देर होना भी बहुत बड़ा कारण है.

योजना घोषित हो जाती है और उसे प्रारंभ करने में इतनी देरी की जाती है कि योजना की लागत शत प्रतिशत से भी ज्यादा हो जाती है. फिर उसके लिये नये सिरे से धन की व्यवस्था की जाती है और फिर लंबी देरी की जाती है और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है. जो कुछ भी विकास होता है वह रखरखाव न होने से और उग्र आंदोलनों में मिटा-जला दिया
जाता है.

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की एन.डी.ए. सरकार ने 1990 के दशक में यह विशाल भारत सड़क योजना राष्टï्रीय राजमार्गों के रूप में प्रारंभ की थी. इसमें उत्तर से दक्षिण, काश्मीर से दक्षिणी छोर कन्याकुमारी तक एक राष्टï्रीय राजमार्ग बनना था और पूरब में असम के सिलचर से गुजरात में सौराष्टï्र के भुज तक राष्टï्रीय राजमार्ग प्रस्तावित था. सन् 1999 में वाजपेयी सरकार के मंत्री श्री जसवंत सिंह ने सिलचर में इसके निर्माण कार्य का शुभारंभ भी कर दिया.

इन 17 सालों में अभी असम राज्य में ही इसके तीन खंडों पर सिलचर से गुवाहाटी तक काम हुआ है और काम कछुआ चाल से चला. भारत के विकास व गति की यह हालत केंद्र सरकार के फास्ट ट्रेक मेगा रोड प्रोजेक्ट की है. दावे यह हो रहे हैं कि हम दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था है जो बहुत तेजी आगे बढ़ती जा रही है. विदेशी पून्जी को भी प्रत्यक्ष निवेश के लिये आमंत्रित किया जा रहा है. केन्द्र व राज्यों में विभिन्न पार्टियों के बीच सत्ता परिवर्तन तो होता जा रहा है, लेकिन शासन-प्रशासन में त्रासदायी ढर्रे में अभी तक कोई परिवर्तन नहीं आ रहा है. राजनैतिक दृष्टिकोण से योजनाओं को बनाया और रोका जा रहा है. काम हो या न हो लेकिन योजनाओं के नामों में जरूर परिवर्तन हो रहे हैं. विभिन्न सरकारों ने रेल बजट में हर साल के बजट सेें रेलवे विकास ने नयी-नयी बढ़ी योजनाओं की घोषणा की.

इनमें आगे चलकर यह घोषणा भी हो गयी कि अधिकांश योजनाओं पर काम शुरु नहीं हुआ है. तीन योजनाएं ऐसी भी हैं जिन पर इन 30 सालों में कोई काम ही नहीं हुआ. भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का विकास व विस्तार इसलिए 7 साल तक रुका पड़ा रहा कि राज्य सरकार वहां से अवैध झुग्गियों को हटा नहीं पायी. जो झुग्गियां 7 साल बाद हटायी गयीं वे 7 साल पहले भी हटायी जा सकती थीं, लेकिन हमारे विकास का ध्येय ही रुके रहो- धीरे चलो है.

निर्भया कांड के जिस जघन्य अपराधी की तीन साल की सजा पूरी हो गयी वह तो छोड़ दिया गया, लेकिन इसी कांड के 5 अन्य फांसी दिये जा चुके बलात्कारी हत्यारों को अभी तक फांसी नहीं दे पाये. इस अर्थ व्यवस्था को कैसे बढ़ाया जायेगा- यही प्रश्नचिन्ह बना
हुआ है.

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