8 जून से मानसून दक्षिण-पश्चिम केरल प्रवेश द्वार से भारत में आ गया और 15 जुलाई तक यह सामान्य गति से बढ़ता हुआ सारे देश में फैल जायेगा. मध्यप्रदेश में इसके 20-21 जून तक आने की संभावना है. विक्रम संवत के अनुसार अषाढ़ का महीना 21 जून से प्रारंभ हो रहा है और मानसून भी ठीक उसी दिन आने की संभावना है. केरल में मौसम विभाग की गणना में मानसून का आगमन 1 जून होता है और 10 जून तक मध्यप्रदेश की गणना है. इस बार यह घोषणा हो गयी थी कि ठीक 1 जून को मानसून केरल आ जायेगा फिर यह खबर आ गयी कि हवायें विपरीत दिशा में चल पड़ी है इसलिए मानसून 5 जून के बाद ही आयेगा और 7-8 जून को आ गया.

गत वर्ष भी यह हुआ कि मानसून गुजरात और राजस्थान तक आ गया और मध्यप्रदेश में आने ही वाला था कि हवाओं का रूख बदल गया और मानसून आने में कई दिनों की देर हो गयी. मानसून की सार्थकता केवल बादलों के आने तक में नहीं है उनकी गति और दिशा दोनों ही उस समय की हवाओं की गति व दिशा के हिसाब से चलती है. मानसून सामान्य तौर पर हवाओं का विधि विधान बादलों के तारतम्य के हिसाब से ही चलता है. गत 4 वर्षों में 15-14-13-12 में जून 1 से जून 6 तक आ गया था. वर्ष 2011 में यह काफी देरी से 29 जून को आया था. गत दो वर्षों से देश में वर्षा औसत से कम हो रही है. लेकिन यह इतनी कम भी नहीं थी कि उसे सूखा कहा जाये. जहां सिंचाई थी वहां खेती सम्हल गयी. वर्ष 14 में त्रासदी बड़ी विचित्र रही कि फसल पकने व कटने के समय बिल्कुल बेमौसम की वर्षा- ओले गिर गये और रबी का गेहूं खेतों में ही झिरी पडऩे और चमक जाने से खराब हो गया.

21 जुलाई से 20 सितम्बर तक वर्षा के सावन-भादों के महीने हैं. मौसम विज्ञान ने अनुमान लगाया है कि गत दो वर्षों में तो अल्प वर्षा रही लेकिन इस वर्ष 2016 में वर्षा औसत से अधिक 106 से 113 प्रतिशत तक होने के आसार हैं. लेकिन पानी गिरा और जंगलों के अभाव में हमेशा की तरह बहकर निकल गया तो कोई लाभ नहीं मिलता है. केवल गणना में नापा जाता है कि इतने सेंटीमीटर वर्षा हो गयी. अब तो यह देखना जरूरी हो गया कि जमीन के अंदर का पानी भूजल कितने सेंटीमीटर बढ़ा. जब ट्यूबवेल चलन में आए तो लोगों में यह भरोसा आ गया कि अब जरा-सी जगह में जहां चाहो पानी ले लो. उस वक्त यह ख्याल भी नहीं था कि जैसे गर्मी में ऊपर कब तालाब, कुओं व नदियों का पानी सूख जाता है उसी तरह ट्यूबवेल सेे जमीन के अंदर का पानी खत्म हो जायेगा और ट्यूबवेल भी सूख जायेंगे. हैण्डपंप का चलन तो जल क्रांति के रूप में हुआ कि अब हर गांव में पानी पहुंच गया. वहां भी संकट के समय में हैंडपंप सूख गये और लोगों को बहुत दूर तक पानी लेने जाना पड़़ता है और टैंकरों से पानी पहुंचाना पड़ता है. हालत यह हो गयी है कि मध्यप्रदेश का देवास और महाराष्टï्र का लातूर टैंकर ट्रेन से पानी पाता है.

यह साल सभी राज्य सरकारों के लिये परीक्षा का साल है कि प्रकृति ने 106 से 113 प्रतिशत पानी दिया पर भूजल में कितने प्रतिशत की वृद्धि हुई. इसका आकलन भी उसी समय होगा कि गर्मी आयेगी और हैण्डपंप कितने दिन चलते हैं. इस समय देश में हवाओं की सामान्य गति 40 किलोमीटर प्रति घंटा है और यही रफ्तार मानसून के बादलों की है. बीच में महाराष्टï्र की सैहाद्री और राजस्थान अरावली, मध्यप्रदेश में सतपुड़ा, विंध्याचल व मेथल पर्वत श्रृंखलाओं के कई हजारों की तादाद में बड़े-छोटे पहाड़ बिखरे पड़े हैं जो बादलों को जल की धारा से पृथ्वी से जोड़ते हैं. जब वर्षा का मौसम बीत जाता है और पानी का अभाव महसूस होने लगता है तब जल संग्रहण की बातें और इरादे तो खूब व्यक्त किये जाते हैं लेकिन जब बरसात आती है तो कहीं कुछ नजर नहीं आता है. आम आदमी आज भी यह नहीं जानता कि वाटर हार्वेस्टिंग क्या और कैसी होती है.