daveनयी दिल्ली,  केन्द्रीय वन,पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्री अनिल माधव दवे ने पर्यावरण संरक्षण के लिए जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर बंद कमरों में सिर्फ नीतियां बनाए जाने पर सख्त एतराज जताते हुए कहा है कि ‘मिनरल वाटर’ पीकर पानी की बूंद के लिए तरसते लोगों की दिक्कत नहीं समझी जा सकती।

श्री दवे ने आज यूनीवार्ता से बातचीत में कहा कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी नीति या योजना सबकी भागीदारी सुनिश्चित किए बिना या उसे एक व्यापक जन अभियान का रूप दिए बिना सफल नहीं हो सकती। ऐसी नीतियां बनाते समय क्षेत्र विशेष की भौगोलिक संरचना ,वहां के स्थानीय निवासियों की दिक्कतें,उनकी जरूरतों अादि सबका ध्यान रखना होगा। इन बातों को दरकिनार कर कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता ।

केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ने की आवश्यकता तो है लेकिन इन सबके बीच लोगों की बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता देनी होगी। बांध निर्माण हो या फिर वन क्षेत्र का मामला या फिर वन्य जीवों और मानवों के बीच संघर्ष की घटनाएं सभी मामलों में स्थानीय लोगों के हित सबसे ऊपर रखे जाने चाहिए,बाकी बातें इसके बाद की हैं।

पर्यावरण सरंक्षण के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों के सवाल पर पर श्री दवे ने कहा कि वे अच्छा काम कर रहे हैं। सरकारी नीतियों में यदि कोई खामी हो तो उसे उजागर करने के लिए ऐसे संगठनाें का होना बहुत जरुरी है लेकिन पर्यावण संरक्षण को फैशन नहीं बनाया जाना चाहिए। विदेशों से धन मंगा कर देश के विकास और जनता के हितों पर हमला करने वाले संगठनों को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा ।