अभी तक विज्ञान, टेक्नोलोजी व अनुसंधान के क्षेत्र में यही चला आ रहा था कि दुनिया के किसी देश में इसे बना-विकसित कर लिया जाता था- उसके बाद भारत व अन्य कई देश उसे अपने देश में ले
आते हैं.

लेकिन पहली बार वह भी रक्षा उपकरण क्षेत्र में भारत फाइटर प्लेन से भी सही-सटीक ठिकाने पर मिसाइल दाग कर दुनिया का पहला ऐसा राष्ट्र बन गया है जो जमीन, जल और हवा तीनों जगहों से सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल दाग सकता है. यह एक विश्व रिकार्ड है.

इसके साथ ही अब भारत गर्व से इस स्थिति में पहुंच गया है जो यह कह सकता है कि दुनिया की सबसे तेज मिसाइल अब हमारे पास है.रक्षा विभाग के मिसाइल वैज्ञानिकों ने इसे बुधवार 22 नवम्बर को सुखोई फाइटर प्लेन से ब्रम्होस मिसाइल सफलतापूर्वक दागा और इसने बंगाल की खाड़ी में निर्धारित निशाने पर मार कर दी.

इस ब्रम्होस मिसाइल की रेन्ज 290 किलोमीटर है और वजन 2.5 टन है. यह मिसाइल भारतीय नौसेना को 2005 में दी गयी थी. इसे नौसेना के सभी विध्वंसक (डेस्ट्रायर) और फ्री गेट युद्धपोतों में लगाया जा चुका है.

इससे भी पूर्व सबसे पहले ब्रम्होस मिसाइल भारत थल सेना (इंडियन आर्मी) को दी गयी थी और उसके पास ब्रम्होस की मिसाइल की तीन बटालियन हैं, जो हमारी चीन व पाकिस्तान से लगी सीमाओं पर तैनात की जा चुकी हैं. अब यह मिसाइल भारतीय वायुसेना में शामिल होकर भारत की तीनों सेनाओं थल, जल, नभ में प्रचंड मारक क्षमता के साथ तैनात हो गयी है.

इसके साथ ही भारतीय वायुसेना दुनिया की पहली ऐसी वायुसेना हो गयी है जिसने ध्वनि की गति से लगभग तीन गुनी तेजी से जमीन पर मार करने वाली मिसाइल का परीक्षण किया है. सुखोई ने पश्चिम बंगाल के कलाईकुन्डा एयरबेस से उड़ान भर कर ब्रम्होस मिसाइल बंगाल की खाड़ी में निश्चित किये गये टारगेट पर ही मिसाइल पहुंचा कर हमला किया है.

सुखोई पर तैनात किये जाने वाला सबसे भारी हथियार यही ब्रम्होस मिसाइल है. इससे भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता में कई गुना इजाफा हो गया है. ब्रम्होस मिसाइल अंडर ग्राउंड बंकरों, कमांड एंड कंट्रोल सेंटरों और समुद्र के ऊपर भी उड़ रहे दुश्मन के विमानों को दूर से ही मार गिरा सकती है.

अब इस ब्रम्होस मिसाइल को 450 किलोमीटर मार करने की क्षमता का बनाया जा रहा है.रक्षा मंत्रालय के डी.आर.डी.ओ. को राष्टï्रपति प्रधानमंत्री व रक्षा मंत्री ने बधायी दी है. यह डिफेन्स रिसर्च डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन नए-नए कीर्तिमान स्थापित करता जा रहा है.

अभी टेक्नोलोजी के क्षेत्र में रेलवे दूसरे देशों से काफी पीछे है. रेलवे में भी डी.आर.डी.ओ. की तरह ऐसा ही संगठन बनाया जाना चाहिए.बड़े भू-भाग के देश में रेलों का विस्तार ही अभी पूरा नहीं हो पाया है. दूसरे देश बुलेट ट्रेन और मोनो रेल के क्षेत्र में पहुंच गये हैं.

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