इस समय भारत की अर्थ व्यवस्था की यह स्थिति बनी है कि मुद्रा स्फीति तो नियंत्रण में है, लेकिन विकास दर अपेक्षा से कम 7 प्रतिशत रह गयी. मुद्रास्फीति घटने की एक बड़ी वजह यह है कि परमाणु देशों और इरान के बीच यूरेनियम पर नियंत्रण रखने का जो समझौता हुआ है जिसके फलस्वरूप उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाने से विश्व बाजार में पेट्रो क्रूड भारी मात्रा में आ जाने से उनके भावों में लगातार तेजी से गिरावट आती जा रही है. वह रिकार्ड गिरावट में 40 डालर प्रति बैरल पर आ गया और गिरावट का दौर जारी है. पिछले 29 सालों में गिरावट का यह सबसे लंबे सिलसिला है. इससे पहले 1986 में उस समय के मूल्यों के आधार पर पेट्रो क्रूड की कीमत 30 डालर से घटकर 10 डालर रह गयी थी. इस समय चल रही भारी गिरावट से भारतीय तेल कंपनियों का आयात बजट काफी कम हो गया और खुले बाजार में भी पेट्रोल-डीजल के दामों में कमी होती जा रही है. एक बहुत ही खटकने की बात यह जरूर हो रही है कि इस कमी के बावजूद भी यातायात माल भाड़ा, यात्री किराया में जरा भी कमी नहीं की जा रही है. इस मामले में केंद्र व राज्य शासनों को भावों के आधार पर इनके स्वयं ही घटने बढऩे के लिये स्टेन्डिंग आर्डर जारी करने चाहिए.

विश्व में ग्रीस संकट के चलते और चीन की अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट के साथ उसकी मुद्रा युआन का अवमूल्यन होने से सभी राष्टï्रों के शेयर बाजारों में मंदी का दौर फिर आया हुआ है. भारत की विकास दर 7.5 से घटकर 7 प्रतिशत रह गयी. निर्धारित लक्ष्य के अनुसार 8.5 प्रतिशत की विकास दर पाना मुश्किल हो गया है. उद्योग क्षेत्र में 8 बड़े (कोर) क्षेत्रों में विकास दर घटकर 1.1 प्रतिशत रह गयी जो इससे पहले 3 प्रतिशत थी. इससे देश में देश में रोजगार के अवसर घटेंगे और औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार कम हो जायेगी. शेयर बाजारों में ग्रीस व चीन के कारण दबाव बढ़ा हुआ है. वहीं यदि अमेरिकी फेडरल रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें बढ़ा दी तो बड़े निवेशक उस तरफ चले जायेंगे और अन्य वैश्विक बाजारों में निवेशकों व पूंजी दोनों का भारी अभाव हो जायेगा. विदेशी निवेश घटने से डालर के मुकाबले रुपया कमजोर हो जायेगा. औद्योगिक उत्पादन और रुपया दोनों के घटने से भारतीय आयात-निर्यात दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा.

इस समय यह उम्मीद की जा रही है रिजर्व बैंक ब्याज दरें घटाकर के आर्थिक माहौल को सम्हालने का प्रयास करेगा. इस संकट के समय जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व बैंक की ब्याज दरें बढऩे से निवेश-पूंजी में कमी हो जायेगी उस समय भारतीय रिजर्व बैंक को देश की आंतरिक अर्थव्यवस्था व उद्योगों के लिए पूंजी और निवेश के वातावरण उपलब्ध व स्वस्थ दोनों स्तरों पर रखना लाजमी होगा. रिजर्व बैंक की लगातार एक ही रट ‘खाद्यान्न मूल्य और खाद्यान्न मुद्रास्फीति’ भारतीय औद्योगिक विकास और उत्पादन को पहले ही ध्वस्त कर चुकी है.

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान 13 प्रतिशत है, शेष अर्थव्यवस्था के अन्य सेक्टर जुटाते हैं. इसमें सबसे ज्यादा योगदान उद्योगों के मैन्युफेक्चरिंग का होता है जो सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर और उपभोक्ता वस्तुएं प्रदान करता है.
केन्द्रीय वित्त मंत्री श्री अरुण जैटली ने आशा व्यक्त की है कि रिजर्व बैंक अपनी मौद्रिक समीक्षा में इस पर विचार करेगा कि देश की समग्र अर्थव्यवस्था को ब्याज दरों में कमी की जरूरत है. इस समय मुद्रास्फीति नियंत्रण में है और पेट्रो क्रूड व अन्य उत्पादों के दाम भी निचले स्तर पर हैं.

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