अंतरराष्टï्रीय मुद्रा कोष ने दक्षिण एशियाई विकास क्षमता केंद्र दिल्ली में खोलने का एक बहुत बड़ा आर्थिक कौशल विकसित करने का बड़ा कदम उठाया है. इस केंद्र को भारत सरकार, दक्षिण कोरिया सरकार और आस्ट्रेलियन एजेंसी फार इन्टरनेशनल डेवलपमेंट वित्तीय सहयोग से स्थापित करेगी. इसके लिये आई.एम.एफ. की डायरेक्टर श्रीमती लगारडे और केंद्रीय वित्तमंत्री श्री अरुण जेटली ने एक करार पर हस्ताक्षर किये. श्रीमती लगारडे ने दिल्ली में स्थापना के लिये भारत के प्रधानमंत्री श्री मोदी के प्रति आभार प्रगट किया.

विश्व में आई.एम.एफ. का पहला केंद्र है जो पूरी तरह प्रशिक्षण और तकनीक का विकास क्षमता विकसित करने पर केंद्रित होगा. यह केंद्र भारत, बंगलादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल व श्रीलंका में मिक्रो इकोनोमिक, फिस्कल मेनेजमेंट, मोनीटरी आपरेशन, फाईनेन्शियल सेक्टर रेग्यूलेशन और मिक्रो स्टेटिक्स पर आधुनिक प्रशिक्षण व वित्तीय कौशल की क्षमता बढ़ाने का काम करेगा. विकास के क्षेत्र में पूरी आधुनिक ज्ञान के प्रयोग से यहां विकास क्षमता बढ़ाने का
लक्ष्य है.

भारत में मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही कौशल विकास को अपना एक बड़ा ध्येय बनाया हुआ है. लेकिन इसमें नारेबाजी व घोषणाओं से बचना भी जरूरी हो गया है. अन्यथा नारों से उम्मीद, आशाएं तो बढ़ती हैं लेकिन कुछ न होने पर निराशा और बढ़ जाती है. काले धन के मामले में यही हुआ है कि उसका आकार-प्रकार फौरन ही वापस ले आने के नारों ने काफी हद तक भारतीय जनता पार्टी व मोदी सरकार को सत्ता तक पहुंचा दिया. लेकिन अब वह जुमला व भपकी तक ही सीमित रह गया है.

कौशल विकास का भी दिया लेकिन यदि उसके अनुरूप युवा वर्ग को अवसर व काम नहीं मिले तो उसका विपरीत और बुरा असर यह भी हो जायेगा कि देश में कौशल प्राप्त शिक्षित बेरोजगार लोगों की बाढ़ आ जायेगी और असंतोष उन्हें या तो निराशा या अपराध की ओर ले जायेगा. मेडिकल और इंजीनियरिंग की शिक्षा को ‘सुपर कौशलÓ मानना ही होगा और आज हालत यह है कि इंजीनियर बेकार घूम रहे हैं.

यह भी एक विडम्बना है कि इंजीनियरिंग कालेजों में सीटें बढ़ायी जा रही हैं और मौजूदा इंजीनियरिंग कालेजों में सीटें खाली पड़ी हैं. यही हाल मेडिकल में हो रहा है. कहा तो यह जा रहा है डाक्टरों को गांवों में जाना चाहिए और शहरों में सरकारी मेडिकल के अस्पताल ही बीमार पड़े हैं- कोई सुविधा नहीं है. मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया उन्हें इस बात के नोटिस व चेतावनी दे रही है कि वे उनके अस्पताल व पढ़ाई स्तरहीन हो गयी है, उन्हें बन्द कर दिया जाएगा.

कौशल विकास और उसके अवसर बिल्कुल समानान्तर स्थिति में ही चलने चाहिए. सरकार का यह निर्णय कि बेकार घूम रहे इंजीनियरों को सरकारी काम के ठेके दिये जायेंगे. यहां यह ध्यान में रखा जाए कि इंजीनियरिंग ज्ञान है और ठेकेदारी धंधा है. दोनों का कौशल अलग होता है. केवल ठेका दे देना और कर्जा दे देने से कोई धंधा नहीं कर पायेगा. धंधा करना भी एक अलग कौशल होता है. सरकार के नारों में व्यवहारिकता की कमी रहती है और उसी का यह नतीजा हुआ कि सरकारें रोडवेज जैसा भारी मुनाफे का धंधा तक भारी घाटे में डुबा बैठी है.

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