भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर श्री रघुराम राजन ने चेतावनी दी है कि चीन उसकी मुद्रा यूआन में अवमूल्यन कर रहा है. इससे दूसरे देशों के आर्थिक व वित्तीय क्षेत्रों में जोखिम हो सकती है. यदि इसके प्रभाव मेें दूसरे देशों ने भी उनकी मुद्रा में अवमूल्यन की नीति अपनायी तो विश्व में मुद्रा युद्ध (करेन्सी वार) छिडऩे की आशंका हो जायेगी.

वैश्विक मांग पूरी करने के लिये सभी देश इस बात के लिये स्वतंत्र है कि वे अपनी मुद्रा का अवमूल्यन (डीवेल्यूऐशन) करें. लेकिन यदि इससे राष्टï्रों में मुद्रा अवमूल्यन की होड़ लग जाए तो विश्व अर्थ व्यवस्था में भारी उलट-पुलट हो सकती है. सन् 60 के दशक में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार में रुपये का अवमूल्यन किया था.

विश्व पिछले दो दशकों से वैश्विक मंदी से जूझ रहा है और इसी बीच ग्रीस में उसके अनाप-शनाप शासकीय खर्चों से देश आर्थिक व वित्तीय दिवालियेपन में आ गया. वह यूरोपीय यूनियन और उसकी मुद्रा ‘यूरो’ का सदस्य राष्टï्र है. इसलिए पूरे यूरोप के व्यापार और आर्थिक व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ा जिसके कारण उसका प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ा.

इस बात की आशंका है कि चीन इन दिनों आर्थिक संकट और उसके गिरते बाजार व व्यापारिक गतिविधियों की गिरावट से परेशान है. वह अवमूल्यन के जरिए में स्पर्धा का लाभ लेने की कोशिश करता नजर आ रहा है. यदि चीन उसकी मुद्रा यूआन को स्थिर रखता है तब कोई संकट की आशंका नहीं है. अन्यथा अन्य देशों द्वारा भी अवमूल्यन करना विश्व में आर्थिक, व्यापारिक अस्थिरता को जन्म देगा.
पिछले कुछ वर्षों में कमजोर मांग होने के कारण कुछ देश उनकी मुद्रा के अवमूल्यन के प्रयास करते रहे हैं. हाल ही यूआन अवमूल्यन का असर भारत के रुपये पर भी देखा गया. पिछले सप्ताह डालर के मुकाबले रुपया दो प्रतिशत से अधिक गिरकर सितम्बर 2013 के बाद के निचले स्तर पर आ गया. उस समय सितम्बर 2013 में भारत दो दशकों के सबसे बड़ी करेन्सी संकट से जूझ रहा था. वैश्विक दबाव और रुपयों की कमजोरी से भारत का बाजार गिरा है. इस पर चीन के बाजार की गिरावट का भी असर पड़ा है.

भारत सरकार इन दिनों बैंकों की वित्तीय हालत सुधारने के लिये 20,000 करोड़ रुपयों की पून्जी दे चुका है और अगले 4 सालों में 70,000 करोड़ रुपया और देने जा रहा है. उसी तरह की हालत चीन के बैंकों की भी हो गयी है. भारत और चीन न सिर्फ एशिया की बल्कि दुनिया की अर्थ-व्यवस्था में बराबरी की प्रतिस्पर्धा में आर्थिक प्रगति के राष्ट्र बने हुए हैं. यहां विदेशी निवेश बहुत आकर्षित हो रहा है. भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) इस साल जून 2015 में करीब 6.5 प्रतिशत से बढ़कर 2.05 अरब डालर पर पहुंच गया. जून 2014 देश में 1.92 अरब डालर का एफडीआई आया था. देश में विदेशी निवेश में 31 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हो रही है. भारत ने सबसे अधिक 3.67 अरब डालर एफडीआई सिंगापुर से प्राप्त किया. देश में विदेशी मुद्रा का आना 27 प्रतिशत बढ़कर 30.93 अरब डालर रहा जो गत वित्त वर्ष में 24.29 अरब डालर था.

चीन ने भी अपने बैंकों को उसके विदेशी मुद्रा भंडार से 6.4 लाख करोड़ रुपयों की पून्जी दी है. इस समय विश्व में आर्थिक उथल-पुथल चल रही हैं.

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