देश ने देश के मुसलमान वर्ग से यह अपेक्षा की थी कि संविधान के सम्मान व परिपालन में देश के नागरिक होने के नाते सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को शिरोधार्य करेंगे कि तीन तलाक असंवैधानिक है और इसका इस्तेमाल नहीं करेंगे.

जब यह फैसला आया था तो मुस्लिम संगठनों ने यह कहा था कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानेंगे. लेकिन साथ में यह भी कहा था कि फैसला पसंदीदा नहीं है. हालांकि अनेक मुस्लिम प्रबुद्ध वर्ग व बुद्धिजीवियों का यह विचार था कि ऐसा नहीं कहना चाहिए बल्कि उसे मुस्लिम महिलाओं के हित संरक्षण व सम्मान में पसंद किया जाना चाहिये.

सरकार को भी यह उम्मीद थी कि मुसलमान तीन तलाक का इस्तेमाल नहीं करेंगे. इसलिये अलग से कोई कानून नहीं बनाया लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से अब तक 6 मामले ऐसे आ चुके हैं जहां तीन तलाक का इस्तेमाल मुसलमान पुरुषों ने किया है.

इस मामले में अलग से कोई कानून न होने की वजह से उन लोगों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकी. अब यह माना गया कि तीन तलाक, मुसलमान स्वेच्छा से खत्म नहीं कर रहे हैं इसलिए उस पर अब एक कानून लाया जा रहा है जिसमें तीन तलाक देने के बाद भी उसे तलाक नहीं माना जायेगा और पुरुष को तीन साल की सजा व औरत को समुचित मुआवजा भी देना होगा.

कभी शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के बाद भी मुसलमान औरत को मुआवजा पाने का हकदार माना गया था जिसका कट्टïरपंथी मुसलमानों ने शरीयत के खिलाफ मानकर विरोध किया था. उस वक्त बुद्धिजीवी व प्रबुद्ध वर्ग के मुसलमानों ने यह कहा था कि मुआवजा देना ठीक फैसला है- इसमें शरीयत का उल्लंघन नहीं होता है. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने कट्टïरपंथी मुसलमान के दबाव में एक कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के मुआवजा देने के फैसले अप्रभावी कर दिया. इसे श्री राजीव गांधी की कमजोरी ही माना जाता है.

लेकिन अब जो तीन तलाक पर कानून आ रहा है उससे तलाक के बाद भी मुआवजा बहाल हो जायेगा. तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और अब उस पर आ रहे कानून से मुस्लिम महिलाओं में और अधिक जागृति आ गयी है.
तीन तलाक पर जो कानून आ रहा है, उसके बारे में मुस्लिम महिला नेताओं ने कहा है कि तीन तलाक देने पर तीन साल की सजा बहुत कम है. इसे 7 या 10 साल की सजा किया जाए. यह भी मांग की है कि देश में मुसलमानों को छोड़कर शेष सभी धर्मों में बहुसंख्यक हिंदुओं में भी बहुपत्नी प्रथा खत्म कर दी गयी है और यह सजा पाने वाला अपराध है.

लेकिन केवल शरीयत के नाम से मुसलमानों को 4 बीवीयों तक शादी करने की बहु विवाह की छूट है. इसे भी नये कानून में जोड़कर खत्म कर अपराध बना देना चाहिये. तलाक के बाद यदि वे मर्द-औरत दोबारा साथ होकर शादी करना चाहें तो उसमें चली आ रही ”हलाला” की प्रथा भी नये कानून में खत्म कर अपराध बना दी जाए. हलाला में औरत को पहले किसी और से शादी करनी पड़ती है तब वह पहले शौहर से फिर से निकाह कर सकती है. यह बहुत ही जघन्य प्रथा है. इसे अपराध बनाया जाए.

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह-संस्थापक श्री जाकिया मोमन ने मांग की है कि तीन तलाक पर लाये जा रहे कानून को व्यापक रूप दया जाये और सभी प्रकार की कुरीतियों को खत्म कर उन्हें अपराध बना मुस्लिम महिला को सही मायने में आजाद किया जाये- उसे आजादी चाहिए.

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