2 जनवरी को देशव्यापी मेडिकल डाक्टरों की हड़ताल केंद्र सरकार के नये कदम के कारण वापस ले ली गयी है. इसी दिन सरकार ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यह निर्णय लिया कि नेशनल मेडिकल कमीशन विधेयक को स्टैंडिंग कमेटी को विचार-विमर्श के लिये भेज दिया और इसी के साथ इंडियन मेडिकल काउंसिल ने अपनी हड़ताल वापस ले ली. यह विधेयक गत शुक्रवार को लोकसभा में पेश किया था.

इस विधेयक में यह प्रावधान है कि आयुष (आयुर्वेद) डाक्टर एक ब्रिज कोर्स करने के बाद ऐलोपैथिक मेडिसिन की प्रेक्टिस कर सकेंगे. इंडियन मेडिकल ऐसोसियेशन का ऐतराज यह है कि इससे क्वेकरी (नीम-हकीम) को बल मिलेगा.

इस विधेयक में यह प्रावधान भी है कि मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया की जगह दूसरी संस्था बनायी जाए. स्टैंडिंग कमेटी संसद के बजट अधिवेशन से पहले अपनी रिपोर्ट पेश करेगी. हड़ताल में 12 घंटे के लिए डाक्टर काम बंद करने वाले थे. हड़ताल वापसी से पहले ही देश में कई जगह हड़ताल शुरु भी हो गई थी.

लोकसभा में विपक्षी दलों की यही मांग थी कि इस विधेयक पर सरकार जल्दबाजी न करे. इस पर पूरा विचार-विमर्श होने के लिए इस विधेयक को स्टैन्डिंग कमेटी को भेजा जाए. संसदीय कार्य मंत्री श्री अनन्त कुमार ने विपक्ष के सुझावों से सरकार की सहमति जताई और इस विधेयक को संसद की स्टैन्डिंग कमेटी को भेज दिया गया.

इंडियन मेडिकल एसोसियेशन को इस बात पर आपत्ति है कि एम.सी.आई. के स्थान पर सरकार जो दूसरी संस्था बनाना चाहती है उसके अध्यक्ष व सदस्यों को केबिनेट सेक्रेटरी की अध्यक्षता वाली समिति करेगी. मेडिकल बिरादरी का कहना है कि इससे मेडिकल काउन्सिल का काम सरकार ही करने लगेगी और डाक्टरों की भूमिका गौण या नगण्य हो जायेगी.

आई.एम.ए. के भूतपूर्व अध्यक्ष डाक्टर के.के. अग्रवाल ने कहा कि इस विधेयक से भ्रष्टाचार का दरवाजा खुल जायेगा. इस विधेयक के प्रावधानों के अनुसार सभी आयुर्वेद, योग, नेचुरोपेथी व यूनानी, होमियोपेथी के चिकित्सक भी ब्रिज कोर्स करके एलोपेथी में प्रेक्टिस करेंगे और इसमें इलाज से ऐसा घालमेल हो जायेगा कि मरीजों को कई तरह की चिकित्सा एक साथ होने लगेगी और पता भी नहीं चलेगा कि किस दवा का क्या अच्छा या बुरा असर हुआ.

इससे मर्यादा विहीन (अनइथीकल) इलाज की भरमार हो जायेगी. हर चिकित्सा पद्धति में अपने-अपने तौर-तरीके होते हैं और उन्हें उनके क्षेत्र में रखा जाये. यह उन डाक्टरों से ज्यादा मरीजों के हित में है कि यह उसकी मर्जी रहे कि वह किस चिकित्सा पद्धति से अपना इलाज कराये. अधिकांश विपक्षी दल के सदस्यों की मांग थी कि इस नेशनल मेडिकल कमीशन विधेयक को ही रद्द कर दिया जाना चाहिए.

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