उत्तर प्रदेश में गोरखपुर व फूलपुर लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड पराजय ने यह साबित कर दिया कि देश में मोदी लहर नहीं है और न ही भारतीय जनता पार्टी अश्वमेघ यज्ञ का वह घोड़ा है जिसे विजय पथ पर कोई रोक नहीं सकता.

इन दो चुनावों के अलावा भी गुजरात में पार्टी की सीटें घट जाना और कांग्रेस की सीटें बढऩा, राजस्थान व मध्यप्रदेश में भाजपा का उपचुनावों में हारना सब यही बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी एक सशक्त अखिल भारतीय पार्टी है लेकिन वह अपराजेय नहीं है.

गोरखपुर व फूलपुर में समाजवादी पार्टी जीती है और मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने उसे जिताया है.
सन् 2014 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने इन दोनों पार्टियों को बुरी तरह हराया था- बहुजन समाज पार्टी शून्य हो गयी थी लेकिन गोरखपुर हार महज एक सीट की हार नहीं है.

यह धार्मिक बस्ती है, यहां कभी गुरु गोरखनाथ बसे थे और तप-तपस्या साधना से यहीं बस गये थे और यह शहर उन्हीं के नाम पर गोरखपुर के नाम से जाना जाता है. यहां का मुख्य केंद्र और पहचान आज भी गुरु गोरखनाथ का मंदिर है जिसके मठाधीश इस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं और पिछले 30 सालों से यहां से भारतीय जनता पार्टी सभी सीट जीतती रही है.

इस समय योगी जी के मुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने यह सीट खाली की थी और यह उप चुनाव हुआ जिसमें जो कुछ हुआ वह भारतीय जनता पार्टी ने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा. फूलपुर से भी श्री केशवप्रसाद मौर्य लोकसभा सदस्य चुने गये थे उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाया गया और फूलपुर सीट उन्होंने खाली की थी- यह सीट भी जो धार्मिक नगरी इलाहाबाद-प्रयाग क्षेत्र में है भारतीय जनता पार्टी हार गयी. ये दोनों सीटें भाजपा की थीं और समाजवादी पार्टी ने उनसे छीन ली.

इन नतीजों से तो यह लगता है कि 2019 के लोकसभा के आम चुनाव में विरोधी मोर्चा बना कर वाराणसी से प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को ही निपटा देंगे. धार्मिक नगरी के नाम पर गोरखनाथ के मठाधीश होने पर और काल्पनिक ‘मोदी लहर’ के नाम पर भी गोरखपुर हारना एक सीट की हार जीत से कहीं ज्यादा संदेश व संकेत दे रहा है.

आजकल हर चुनाव में न जाने क्यों ‘लहर’ शब्द का प्रयोग होने लगा है जो हर तरह से अतिरंजित अतिश्योक्ति है. अभी तक देश में तीन बार ‘लहर’ की स्थिति आयी और वह भी उसी चुनाव तक सीमित रही उसके स्थायी प्रभाव नहीं थे. सबसे पहले इंदिरा गांधी के शासन काल में लगभग सभी विरोधी दलों ने मिलकर ‘महागठबंधन’ बनाया लेकिन इंदिरा गांधी के नेतृत्व में ‘गरीबी हटाओ’ नारे व कार्यक्रम से महागठबंधन के धज्जे उड़ा दिये और यह स्थापित हो गया कि यदि पार्टी दमदार है तो गठबंधन बेकार है.

दूसरी बार 1977 में जयप्रकाश नारायण की लहर जनता पार्टी के रूप में आई और कांग्रेस उस आंधी में उड़ गयी लेकिन तीन साल के बाद 1980 में फिर इंदिरा लहर आई और उसने पलटवार में जनता पार्टी सत्ता से बाहर और संगठन के रूप ‘टुकड़े हजार हुए’ बनाकर उसका मटियामेट कर दिया.

इन दिनों भारतीय जनता पार्टी ‘मोदी लहर’ के नशे में आ गयी और लगता है गोरखपुर व फूलपुर से उसका यह नशा उतर गया होगा. 2019 का लोकसभा का चुनाव किसी ‘लहर’ पर नहीं बल्कि राजनैतिक शक्ति व सामथ्र्य पर होगा.

सन् 2014 के लोकसभा के आम चुनाव के बाद राज्यों में 20 लोकसभा के उपचुनाव हुए जिनमें भाजपा की 8 सीटें थीं लेकिन उपचुनाव में भाजपा केवल तीन सीटें ही बचा पायी, शेष पर हारी थी. कांग्रेस को भी केवल नाम और राहुल पर ही नहीं टिके रहना चाहिये.

इस बड़ी जीत में यह बात दब गयी है कि इन उपचुनावों में कांग्रेस उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हुई हैं. पार्टी चलेगी तभी नेता चलते हैं. इस समय उत्तर प्रदेश जैसे 80 लोकसभा सीटों में कांग्रेस के पास मात्र दो एक श्रीमती गांधी की रायबरेली और राहुल गांधी अमेठी सीट भर से जीत पाये थे. विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी से गठबंधन के बाद भी उनके महज सात विधायक हैं.

बिहार के उपचुनाव इस मामले में साधारण कहे जा सकते हैं कि पिछले चुनावों में जिस पार्टी की जो सीट थी इन उपचुनावों में भी उसे वहां से विजय मिली. अररिया लोकसभा सीट राजद की थी- वही जीती.

विधानसभा के लिये उपचुनावों में जहानाबाद राजद की थी उसे फिर मिल गयी और भाजपा अपनी भभुआ सीट फिर जीत गयी. इन उपचुनावों में किसी भी दल को 2019 के चुनावों की जीत-हार नहीं आकनी चाहिए. लेकिन किसी भी पार्टी ‘लहर’ के भरोसे भी नहीं रहना चाहिए बल्कि जमीन देखनी चाहिए.