भोपाल,

यदि मनुष्य अपना कल्याण चाहता है तो उसे दो चीजों को कभी नहीं भूलना चाहिए. मन शुद्धि का सर्वाधिक सहज एवं सरल उपाय श्रीमद भागवत कथा है. मनुष्य में सबसे पहले मन की शुद्धि आवश्यक है.

सारे संसार के स्वामी भगवान के पास सिर्फ एक वस्तु का अभाव है और वह मन है. यदि यह वह उन्हें दे दिया जाए तो प्रसन्न किया जा सकता है. लेकिन कैसा भी मन नहीं बल्कि इसके लिए गुणवत्तापूर्ण मन की आवश्यकता होती है. यह मन निर्मल, निश्चल, निष्कपट होना चाहिए. उक्त उद्गार आज श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिन कथा व्यास बद्रीश जी महाराज ने गुरूदेव ब्रह्मानंद सरस्वती आश्रम, छान में व्यक्त किये.

भागवत कथा प्रारंभ होने के पूर्व महर्षि समूह के मुखिया ब्रह्मचारी गिरीश जी एवं महर्षि वेद विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. भुवनेश शर्मा ने गुरू पुजन कर व्यास गद्दी की पूजा अर्चना की. इसके पश्चात् श्रीमद्भागवत कथा प्रारंभ हुई.

श्रीमद्भागवत कथा के दौरान बद्रीश जी महाराज ने कहा कि महापुरुष अपनी जबान गंदी नहीं करते उन्हें जो कहना होता है वह आपके ही मुख से कहलवा देते हैं. उन्होंने इस प्रसंग को उदाहरण देकर समझाया कि एक बार एक राजा का प्रिय हाथी बूढ़ा एवं बीमार हो गया.

उन्होंने सभी महावतों को उसका विशेष ध्यान रखने के निर्देश दिये और स्वयं भी समय-समय पर उपस्थित होकर हाथी का स्वास्थ जानते रहते थे. किन्तु हाथी दिनोंदिन बहुत बीमार हो चला तब अपने प्रिय हाथी की यह दशा देखकर उनसे रहा न गया.

उन्होंने अपने कर्मचारियों को निर्देश दिया कि जो भी उनके प्रिय हाथी की मौत की खबर देगा उसे दंडित किया जायेगा. तभी एक दिन अचानक हाथी की मौत हो गई. मृत्युदंड के भय से यह सूचना देने के लिए कोई तैयार नहीं था. तभी एक महावत ने इसकी जिम्मेदारी ली एवं राजा के समक्ष पहुंचे. राजा ने पूछा हाथी खा-पी रहा है.

उन्होंने कहा नहीं. फिर उनसे पूछा उसके कान हिलते हैं. महावत ने कहा नहीं. फिर उन्होंने कहा तो क्या वह मर गया. तब महावत ने कहा महाराज यह आपने कहा है, मैंने नहीं. इसका मतलब महावत मृत्युदंड से भी बच गया और अपनी बात भी उनके मुंह से कहलवा दी.

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