मध्यप्रदेश में अभी-अभी बरसात का मौसम गया है. इस बार यह पिछले कई सालों की अल्प वर्षा के स्थान पर अतिवर्षा का वर्ष रहा. यह माना ही जा रहा है कि इस साल भी मध्यप्रदेश में गेहूं और चने की बम्पर फसलें आयेंगी. सरकार ने गेहूं व चने के समर्थन मूल्य और उनकी खरीदी लक्ष्य में बढ़ोतरी भी कर दी. भंडारण व परिवहन आदि की जोरदार तैयारियां भी चल रही हैं.

इस समय ठंड का मौसम भी आ गया. सारे प्रदेश में ठंड का अहसास होने लगा. सागर, छतरपुर, अशोकनगर, विदिशा, रायसेन आदि कई जिलों में सुबह देर तक कोहरा छाने लगा. कोहरे के कारण दिल्ली की तरफ से आने वाली सभी रेलें देर से चल रही हैं. सभी लोग ठंड के आगमन के लिए तैयार हो रहे हैं. प्रदेश का सबसे कम तापमान 10 डिग्री सेल्सियस उज्जैन में रिकार्ड किया गया. ऐसे में ही उज्जैन के पास के मालवा के राजगढ़ जिले से एक अजीबोगरीब खबर आई है कि ठंड के आते ही वहां भू-जल के स्तर में तेजी से कमी आ रही है. एक ही सिंचाई में भारी बरसात के बाद कुओं से पानी गायब हो गया, वहां के जिला कलेक्टर को संबंधित विभागों को आवश्यक कदम उठाने व सचेत रहने को कहा गया है. इस बार गेहूं-चने की बुवाई राज्य भर में बड़े पैमाने पर हुई है. गेहूं की फसल को पांच-छह बार सिंचाई की जरूरत होती है. आमतौर पर ठंड के मौसम में सिंचाई के बाद कुएं व बावडिय़ों में कुछ ही घंटों में पुन: उतना ही पानी वापस भर जाता है. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा है. एक-दो बार की सिंचाई के बाद ही कुएं व अन्य जल स्रोतों का भूजल स्तर काफी नीचे चला गया है. राजगढ़ जिले में इस वर्ष औसत वर्षा 1102 मिलीमीटर की तुलना में 1505 मिमी. हुई है जो 400 मिलीमीटर अधिक है.

यदि यही भूगर्भीय स्थिति राज्य के दूसरे इलाकों में भी पाई गई तो राज्य के रबी फसल के अनुमान ही गड़बड़ा जायेंगे. राजगढ़ के भूजलविद् अधिकारी ने इस बात की पुष्टि की है कि नवम्बर माह में ही ऐसे हालात पैदा हो रहे हैं. आमतौर पर गर्मी के दिनों में भूजल नीचे चले जाने की गंभीर स्थिति पैदा होती है. जब कई गांवों, शहरों में दूर से टैंकरों के जरिये पानी पहुंचाया जाता है. देवास में पूरी टैंकर ट्रेन से पानी सप्लाई होता है. इस बार भूजल में जो अजीबोगरीब परिवर्तन ठंड के प्रारंभ से ही देखने में आ रहा है, उसकी विवेचना भूगर्भ वैज्ञानिकों को तुरन्त प्रारंभ कर देना चाहिए, यह असाधारण स्थिति इस बार कैसे बन रही है.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
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