DSC_1519भोपाल, 31 अगस्त, नससे. दुनिया में अगर पेट का आजाब न होता तो ये बंदा भी किसी बंदे का मोहताज न होता. हमारा भी समाज है, हम भी इंसान हैं और राजाभोज के वक्त से आज तक भुजरियों का त्यौहार हम मनाते चले आ रहे हैं. इसमें भोपाल तथा आसपास के इलाकों के किन्नर तैयारी करके शहर में आते हैं. किन्नरों के ग्रुप हाजी सुरैया नायक ने कहा कि सड़कों पर मेहनत करके हम अपने पेट को पालते हैं.

हमारे हर साथी के सिर पर भुजरियां रखी हुई हैं. एक तरफ लोग गीत गाकर जहां लोगों का मनोरंजन करते हैं वहीं देखने वाले दूर-दूर से यहां आते हैं. हकीकत तो यह है कि किन्नरों की भुजरियों का त्यौहार पूरे शहर में चर्चा का विषय बन जाता है. कुछ लोग कहते हैं कि भोपाल की बेगम के समय से इस त्यौहार को मनाया जा रहा है. फिल्मी अंदाज में जो गाने खासतौर पर गाये गये उसमें ‘मौसम है आशिकाना ए दिल…, जिसकी छाती पर है कैलास उस पर है महादेव का वास…’ ऐसे तराने अकीदत से भरे होते हैं. जबकि युवा पीढ़ी के किन्नर जींस पेन्ट और टी-शर्ट पहने हुये रंगीन नये दौर के गाने भी गाते नजर आये.

पुराने शहर के मंगलवारा, बुधवारा, घोड़ा नक्कास आदि स्थानों पर ये किन्नर निवास करते हैं. अलग-अलग टोलियों में इनके गुरु होते हैं. जब ये सज-संवर कर निकलते हैं तो खासकर भुजरियों के त्यौहार और अन्य उत्सवों में तो लोग ताकते रह जाते हैं. इस बार भुजरियों के पर्व पर 18 से लगाकर 70 वर्ष तक के किन्नरों ने भाग लिया. शहर के मुख्य-मुख्य मार्गों से होता हुआ यह जुलूस मौज-मस्ती करते हुये निकला तो हजारों लोग इनका स्वागत करते देखे गये.

आज युवा किन्नरों ने तो समां ही बांध दिया. कई स्थानों पर गुलाब डांस पेश किया गया तो दूसरी टोली मोगरा डांस करती हुई दिखी. हसीन, खूबसूरत बलाओं पर लोगों की नजर जमी रही. किन्नरों के गुरु हाजी सुरैया नायक ने कहा कि पुराने वक्त में जिस तरह स्वागत होता था उसमें चाय, मीठे समोसे, खजूरें, खीर आदि लोग बांटते थे. लेकिन अब यह दौर धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है.

भुजरियों के इस पर्व पर लखेरापुरा, जुमेराती बाजार, घोड़ा नक्कास, काजी कैम्प, सोमवारा, सुल्तानिया रोड, भोपाल टॉकीज आदि स्थानों पर किन्नरों ने इस पर्व को धूमधाम से मनाया. इसमें खास बात यह थी कि लोग अपने छोटे-छोटे बच्चों को भुजरियों के नीचे से निकाल कर मन्नतें मांग रहे थे. इसी प्रकार बुजुर्ग अपनी मर्जी से उन्हें इनाम दे रहे थे.

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