केंद्र की मोदी सरकार की नयी यूरिया रासायनिक खाद नीति बहुत ही स्वागत योग्य है कि भारत को न सिर्फ यूरिया खाद में आत्मनिर्भर बनाना है बल्कि इतना उत्पादन करना है कि हम इसका निर्यात भी कर सके.

भारत कृषि प्रधान देश है लेकिन यह रासायनिक खादों की जरूरतों के लिये विदेशों से किये जाने वाले आयात पर निर्भर है. उसकी वजह से इसकी लागत बहुत आती है और उस पर सरकार द्वारा सबसिडी दिये जाने से राष्टï्रीय बजट पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है.

आजादी के समय देश में कृषि की इतनी दुर्दशा थी कि हम अपनी जरूरत का अनाज गेहूं, चावल, ज्वार आदि पैदा नहीं कर पा रहे थेे. लंबे अर्से तक अमेरिका, कनाडा व आस्ट्रेलिया से इसका आयात करना पड़ा.

कृषि वैज्ञानिक बोरलोग की हरित-क्रांति के प्रयोग से रायासनिक खादों का चलन विश्व के साथ-साथ भारत में प्रारंभ किया गया है. आज कृषि में इतनी उन्नति हो गयी है कि हम न सिर्फ खाद्यान्न में आत्मनिर्भर है बल्कि इनका निर्यात भी करने लगे है. लेकिन उपलब्धि का आधार रासायनिक खादों में अभी भी हम आयातक देश ही बने हुए है.

पिछली सरकारों ने देश में कई रासायनिक खाद के कारखानें डालें. इनमें बिहार का सिन्दरी खाद कारखाना सबसे बड़ा था. कृषि की इतनी बड़ी जरूरत होने के बाद भी ये कारखानों घाटे में चले और सरकार ने सिन्दरी सहित तलचर, रामागुन्डम, गोरखपुर और बरोनी के खाद कारखाने बंद कर दिये. अब इन सभी बंद पड़े खाद कारखानों को निजी क्षेेत्र की भागीदारी से पुनरुद्धार कर उनसे उत्पादन शुरु होगा. इसके साथ ही उत्तर-पूर्व में असम के नामरूप में 8.6 लाख टन वार्षिक क्षमता का एक नया खाद प्लान्ट डाला जा रहा है. इस समय नेप्था आधारित यूरिया खाद की इकाइयां- मद्रास फर्टीलाइजर, मनाली मंगलौर फर्टीलाइजर और सदर्न पेट्रो केमिकल इंडस्ट्रीज काम कर रही है. इनमें उत्पादन बढ़ाया जाएगा.

मध्यप्रदेश कृषि उत्पादन में देश में अग्रणी राज्य बन चुका है. इसे तीन बार से लगातार उत्कृष्ट कृषि उत्पादन उपलब्धि के लिये ‘राष्ट्रीय कृषि कर्मणÓ पुरस्कार दिया जा रहा है. लेकिन यहां के किसानों को हर साल रबी व खरीफ के मौसम में रासायनिक खाद की कमी महसूस होती है. स्थिति यहां तक आ जाती है कि किसान यूरिया के ट्रक लूटने लगते हैं. जहां असम में एक नया रासायनिक खाद कारखाना लगाया जा रहा- वहीं राज्य के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान उनकी औद्योगिक विकास और कृषि विकास की नीतियों के अंतर्गत यह प्रयास करे कि मध्यप्रदेश में भी रासायनिक खाद के कारखाने डाले जायें. मध्यप्रदेश की स्वयं की जरूरत ही काफी है. यहां से पश्चिमी तटों के बन्दरगाहों से खाद का निर्यात भी किया जाना ज्यादा सहूलियत का होगा.

अभी यूरिया का गैर-कानूनी उपयोग भी बहुत हो रहा है. नयी नीति में इसे रोकने की भी व्यवस्था की गयी है. जैसे सब्सिडी के घासलेट-केरोसीन तेल में नीला रंग मिलाकर उसे अलग पहचान दी जाती है, उसी तरह अब देश के खाद कारखानों को यूरिया में नीम का लेपन करना होगा. जिससे उसका कृषि के अलावा दूसरा दुरुपयोग रुक जायेगा.

सरकार जैविक कृषि प्रणाली अपनाने पर जोर दे रही है. उसे यह सार्वजनिक रूप से प्रचारित व प्रमाणित करना होगा कि रासायनिक खाद की खेती से कम उत्पादन नहीं बल्कि उतना ही या उससे ज्यादा ही होगा. उसमें कमी नहीं आयेगी. शिक्षा में लगातार इतने प्रयोग किये जा रहे हैं कि इस समय शिक्षा का क्या रूप है यही पता नहीं चल रहा. कृषि उत्पादन में ऐसा कोई प्रयोग न किया जाए, जिससे उत्पादन ही कम हो जाए.