थियेटर ओलम्पिक्स में लेखक विभूति नारायण की मास्टर क्लास

  • यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी रहे हैं विभूति

भोपाल,

रचनाएँ कभी मनुष्य विरोधी नहीं होतीं. ये कहना था विभूति नारायण राय का. वे आज थियेटर ओलम्पिक्स की मास्टर क्लास के प्रमुख वक्ता थे.

संस्कृति विभाग के सहयोग से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली द्वारा आयोजित रंग संसार के भव्य आयोजन आठवें थियेटर ओलम्पिक्स 2018 के तीसरे दिन भारत भवन प्रसिद्ध लेखक विभूति नारायण राय ने कलाओं का अंतर-संबंध विषय पर चर्चा की.

आजमगढ़, उत्तर प्रदेश में जन्मे विभूति नारायण राय 1975 बैच के यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी रहे हैं. विशिष्ट सेवा के लिये राष्ट्रपति पुरस्कार तथा पुलिस मैडल से सम्मानित राय एक पुलिस अधिकारी के साथ.साथ एक उच्चकोटि के कथाकार के रूप में भी जाने जाते रहे हैं. आज के आयोजन में विभूति ने लेखन और निर्देशन कला के आपसी समझ और संबंध के उपर अपने विचार यहाँ उपस्थित श्रोताओं-कलाकारों से साझा किये.

उन्होंने बताया लेखन और निर्देशन दोनों ही अलग विधाएं हैं पर साथ काम करने के लिए आपसी सामंजस्य होना बहुत जरूरी है. लिखते समय किताब का हर शब्द लेखक का होता है. लेकिन कहानी का नाट्य रूपांतरण निर्देशक का होता है.

निर्देशक को आजादी होती है वो कहानी को किस रूप में मंच पर प्रस्तुत करता है, परन्तु कहानी की मूल आत्मा खत्म नहीं होनी चाहिए. अपने लेखन के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया वो पुलिस की नौकरी में होते हुए भी दोहरी जि़न्दगी जीते आये. दिन भर में उनका सामना कई अच्छे बुरे लोगों से होता था और यही उनकी कथाओं उपन्यास के पात्र बनते गए अपनी नौकरी से बचे हुए वक्त में वो अपना समय कलाकारों के साथ बिताते थे.

आरम्भ में अजीत राय ने विभूति नारायण का पुष्पगुच्छ देकर स्वागत किया. इस कार्यक्रम में उनके साथ शहर के जाने माने वरिष्ठ रंगकर्मी आलोक चटर्जी भी सूत्रधार के रूप में उपस्थित रहे और कार्यक्रम को संचालित किया.

सच्ची कहानियों पर आधारित है लेखन

अपने लेखन में हमेशा उन्होंने उन जीवंत किस्सों का उपयोग किया जो वास्तविकता में उन्होंने देखा. विभूति का कहना था हर युग की कहानी का अपना दु:ख होता है लेकिन किसी भी कहानी का अंत अति महत्वपूर्ण होता है. अंत ही उस कथा को आगे तक ले जाता है.

नाटक में राजनीति के हस्तक्षेप की बात पर विभूति ने कहा की कोई भी राजनीति से मुक्त नहीं रह सकता, जो ये कह रहा है वो राजनीति नहीं करता वो एक अलग प्रकार की राजनीति कर रहा होता है.

भारत भवन में मंचित होने वाले नाटक प्रेम की भूतकथा के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि मसूरी में रस्किन बॉँड की छोटी सी कहानी पढ़ते हुए उस से प्रेरित होकर ही उन्होंने प्रेम की भूतकथा उपन्यास की रचना की, जो 1990 के दशक के मसूरी की दास्तान बयां करता है.

मिला अंतर्राष्ट्रीय सम्मान

प्रस्तुत उपन्यास तबादला पर उन्हें अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान प्राप्त हुआ है. उनका उपन्यास शहर में कफ्र्यू् हिंदी के अलावा अंग्रेजी, उर्दू, असमिया, पंजाबी, बांग्ला, मराठी आदि में भी अनुदित हो चुका है. उनके एक अन्य उपन्यास किस्सा लोकतंत्र के लिये उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का भी सम्मान प्राप्त हुआ है. उपन्यासों के अलावा उनका व्यंग्य-संग्रह एक छात्र-नेता का रोजनामचा भी बहुत लोकप्रिय है.

प्रेम की भूतकथा और द लोनली रूम का हुआ मंचन

थिएटर ओलम्पिक्स के तीसरे दिन शुक्रवार को शाम भारत भवन में शाम 5:30 बजे हिंदी नाटक प्रेम की भूतकथा का मंचन हुआद्य नाटक का निर्देशन सुविख्यात रंगकर्मी दिनेश खन्ना ने किया. विभूति नारायण राय के उपन्यास पर आधारित नाटक प्रेम की भूतकथा 1 घंटा 45 मिनट की अवधि में दर्शकों को एक अलग दुनिया ले जाता है. मंच पर 1909 के दशक के मसूरी का सेट लगा हुआ है.

उस वक्त मसूरी में दो घटनाएँ होती है. एक बिजली की उत्पत्ति और किसी व्यक्ति की नृशंस हत्या. कहानी एक रहस्यमयी अंदाज़ में आगे बढ़ती है जहाँ नाटक का मुख्य पात्र, जो एक पत्रकार है जो भूतों के साथ अपने अनुभव की जाँच पड़ताल कर रहा है वो ऐसे सबूतों की तलाश में है जिनके जरिये भूतों के अस्तित्व को साबित किया जा सके.

इस प्रक्रिया में उसकी मुलाकात उन लोगों से होती है जिनके पास अपने रहस्य उलझे पड़े हैं. अपनी खोज यात्रा में वो नैनीताल जेल, मसूरी और देहरादून जाता है जहाँ उसके सामने एक प्राचीन अतिनैतिक और रहस्यमयी कहानियों का पर्दा खुलता है. नाटक के निर्देशक दिनेश खन्ना राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से स्नातकोत्तर हैं. अज्ञेय के काव्य पर आधारित और नटरंग संस्थान के लिए प्रस्तुत उनकी रंग प्रस्तुति बावरा अहेरी का बड़े पैमाने पर स्वागत हो चुका है.

Related Posts: