मुंबई.  रबर उत्पादों का निर्यात की वृद्धि दर पिछले तीन वित्त वर्षों के दौरान घटी है, जबकि पिछले दो दशकों से इस क्षेत्र की वृद्धि दर दो अंकों में बनी हुई थी. ऑल इंडिया रबर इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष मोहिंदर गुप्ता ने कहा कि यह बड़ी चिंता की बात है क्योंकि रबर उभरता हुआ क्षेत्र है और कुछ निर्यात बाजारों में आर्थिक मंदी के बावजूद इसमें निर्यात की अपार संभावनाएं हैं.

रसायन एवं सहायक उत्पाद निर्यात संवर्धन परिषद ) के आंकड़ों के मुताबिक 2014-15 में रबर उत्पादों का निर्यात 5 फीसदी बढ़कर 2.82 अरब डॉलर रहा, जो 2013-14 में 2.74 अरब डॉलर था. निर्यात में बढ़ोतरी टायरों से इतर रबर उत्पाद बनाने वाले उद्यमियों की बदौलत रहा है क्योंकि रबर निर्यात पैनल के तहत निर्यात 10 फीसदी बढ़ा है, वाहन टायरों में गिरावट आई है.

तथ्य यह है कि छोटी रबर इकाइयां महज 10 फीसदी के दर से बढऩे में कामयाब रही हैं जबकि निर्यात का समूचा माहौल बहुत अच्छा नहीं था, इससे संकेत मिलता है कि अगर रबर इकाइयों के लिए बेहतर नीति बनाई जाए तो उनमें बढ़ोतरी की काफी गुंजाइश है. वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी करीब 1.48 फीसदी है जबकि चीन की हिस्सेदारी 11 फीसदी है. आने वाले 5-7 सालों में भारत की हिस्सेदारी आसानी से बढ़ाकर 5 फीसदी तक लाई जा सकती है और भारत की रैंकिंग को भी मौजूदा 19वें पायदान से बढ़ाकर 5वें पायदान पर लाया जा सकता है. सबसे पहले कच्चे माल के आयात के लिए सुविधाएं मुहैया कराई जानी चाहिए. प्राकृतिक रबर के उत्पादन के मामले में भारत अन्य देशों से काफी पीछे है, इसलिए प्राकृतिक रबर का आयात करना ही पड़ता है.

हालांकि प्राकृतिक रबर के आयात पर 25 फीसदी आयात शुल्क है जबकि मुक्त व्यापार समझौते के तहत रबर के उत्पाद 10 फीसदी या इससे भी कम दरों पर आयात किए जा सकते हैं. एआईआरआईए ने रबर उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अलग से रबर निर्यात संवर्धन परिषद का गठन करने की मांग सरकार के समक्ष रखी थी ताकि रबर उद्योग की निर्यात संबंधी संभावनाओं को पूरा उपयोग किया जा सके.