पांच राज्यों में विधानसभाओं के आम चुनावों व दो राज्यों में से एक में सरकार बनाने की और दूसरे में सरकार गिराने की राजनैतिक हलचलें चल रही हैं.
असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल व पडुचेरी में विधानसभाओं के चुनाव इसी साल में होने जा रहे हैं और अगले साल 2017 में उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में विधानसभाओं के चुनाव होंगे.

इस समय जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, उनमें असम में कांग्रेस के मुख्यमंत्री श्री तरुण गोगोई की सरकार है, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी सरकार, तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक की मुख्यमंत्री जयललिता की सरकार, केरल में कांग्रेस नेतृत्व में मुख्यमंत्री श्री ओमान चांडी की सरकार और केन्द्र शासित पडुचेरी में भी अन्नाद्रमुक सरकार है. इन राज्यों में केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की कोई विशेष राजनैतिक भूमिका या हस्ती नहीं है. इन जगहों में वह अपनी पार्टी की कुछ उपस्थिति ही दर्ज करा पायेगी. असम में वह जरूर प्रयत्नशील है कि यहां कुछ ताकत बन गयी तो यह उसे अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में भी जमने में काफी मदद हो जायेगी.

तमिलनाडु में द्रविड मुनैत्र के नाम से अनेक पार्टियां हैं- जो जिला स्तर के नेता चलाते हैं और चुनावों के समय अन्ना द्रमुक व करुणानिधि की द्रमुक से गठबंधन कर उनके लिये कुछ सीटें पाकर संतुष्ट हो जाते हैं. यहां जयललिता व करुणानिधि के बीच ही सत्ता आता-जाती रहती है. केरल में कांग्रेस व माक्र्सवादी कम्युनिस्टों के बीच दो मोर्चों के बीच ही सत्ता की आवाजाही एक अर्से से चली आ रही है. पडुचेरी में आमतौर पर तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक व द्रमुक के साथ ही उसी के अनुसार सरकार बनती रहती है.

पश्चिम बंगाल में अवश्य ही जोरदार राजनैतिक संघर्ष होगा. यहां तीन दशकों तक शासन कर चुकी माक्र्सवादी सरकार को ममता बनर्जी ने कांग्रेेस से मिलकर उखाड़ फेंका था. बाद में उन्होंने यह पाया कि स्वयं के बहुमत में है तो उन्होंने कुछ समय तक तो कांग्रेस से साझा सरकार चलायी और बाद में उनसे पल्ला झाड़ कर अब अपनी ही पार्टी की एकमेव सरकार बनाये हुए हैं. कांग्रेस भी असम के अलावा यहां या तमिलनाडु में कोई खास निर्णायक स्थिति में नहीं है. वह यहां कुछ राजनैतिक सहारे ढूंढ रही है. पिछले बार ममता बनर्जी के साथ थी- इस बार कम्युनिस्टों से जुडऩे में थोड़ी हिचक हो रही है.

काश्मीर में महबूबा मुफ्ती की राजनैतिक चाल भारतीय जनता पार्टी ने विफल कर दी. उन्होंने सरकार बनाने में जल्दबाजी नहीं की. वह चाहती थी कि भाजपा कुछ उतावलापन दिखायेगी तो उससे सौदेबाजी हो जायेगी. भाजपा भी खामोश रही. वहां राज्यपाल शासन लग गया और अगर मुफ्ती की मृत्यु के बाद 6 महीने तक सरकार नहीं बनती तो विधानसभा भंग कर नये चुनाव हो जाते. यह नौबत आ ही गयी थी कि महबूबा को अकड़ छोड़ सरकार की पकड़ करनी पड़ी. अब भाजपा उन पर दबाव बना रही है कि उपमुख्यमंत्री को गृह विभाग दिया जाये. महबूबा समझ गयी है कि नये चुनाव में उनकी पार्टी पीछे चली जायेगी और भारतीय जनता पार्टी आगे आ जाएगी.

एक काश्मीर का बंटवारा तो सन् 1948 से भारत और पाकिस्तान के बीच चला आ रहा है. दूसरा राजनैतिक बंटवारा अब काश्मीर घाटी व जम्मू के बीच हिन्दू-मुसलमान की सांप्रदायिकता में हो चुका है. घाटी में दोनों ही पहलुओं में निर्णायक स्थिति की परिस्थतियां बन रही हैं.

उत्तराखंड में सरकार तो कांग्रेेस की है. कभी भारतीय जनता पार्टी ही हुआ करती थी. 70 सदस्यीय विधानसभा में दोनों के बीच बहुमत व अल्पमत में बहुत कम अंतर रहता था. जब भाजपा की सरकार थी तो वहां अन्दुरुनी राजनीति से मुख्यमंत्री खन्डूरी उखाड़ दिये गये. कांग्रेस सत्ता में आयी तो मुख्यमंत्री पद से हरीश रावत ने विजय बहुगुणा को उखाड़ खुद काबिज हो गये. अब हरीक उन्हें उखाडऩे में लगे है. 28 मार्च को उन्हें विश्वासमत हासिल करना था कि 27 मार्च को ही वहां राष्टï्रपति शासन लग गया.

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