राज्यों में राज्यपालों की भूमिका इतनी विवादित हो गयी है कि अब यह जरूरी हो गया कि राष्टï्रपति संसद व सुप्रीम कोर्ट उनके अधिकारों की स्पष्टï व्याख्या करें. राज्यों में राज्यपालों व मुख्यमंत्रियों के बीच टकराव बढ़ते जा रहे है और यह टकराव भी अपने आप में संविधान संकट पैदा कर रहा है. कई मामलों में राज्यपाल की टकराव में भूमिका उचित मानी गयी और ऐसे भी मामले हुए कि उनके कदम को सही नहीं माना और उन पर केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के राजनैतिक हित साधने के भी आरोप लगे. उनके निर्णयों को सर्वोच्च न्यायालय… ने कभी सही तो कभी गलत भी ठहराया.

हाल में संपन्न हुए राज्यपालों के सम्मेलन में राष्टï्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने अपने संबोधन में राज्यपालों को संविधान की पवित्रता बनाये रखने की सलाह दी. भारत की प्रगति इसी कारण हो रही है कि हम हर कदम पर संविधान में दिये गये सिद्धांतों पर सख्ती से चल रहे है. संविधान चिरस्थायी दस्तावेज है और हमें इसकी पवित्रता बनाये रखनी चाहिए.

इसी समय अरुणाचल के मामले में सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भी आ गया राज्यों के राज्यपाल मुख्यमंत्रियों के अधिकार अपने हाथ में नहीं ले सकते. सरकार का बहुमत जानने के लिये राज्यपाल उनके स्वनिर्णय से विधानसभा का सत्र नहीं बुला सकते. अरुणाचल सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में विधायक विद्रोह व दल बदल की स्थिति बनी हुई है. मुख्यमंत्री नवाज तुकी के विरुद्ध विधायक विद्रोह से उनका बहुमत है या नहीं इसका संविधान परीक्षण का दायित्व राज्यपाल श्री राज खोवा…. पर आ गया है. उन्होंने इसके लिये विधानसभा सत्र जो मुख्यमंत्री ने जनवरी में बुलाया था उसके स्थान पर उसे दिसंबर में बुला लिया. राज्यपाल के इसी निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी और सुप्रीम कोर्ट ने इसे गलत माना. क्योंकि संविधानिक व्यवस्था में विधानसभा का सत्र केवल मुख्यमंत्री की सलाह व अनुशंसा पर ही बुला सकता है.

देश में एक बार विधायकों के दल बदल का जबरदस्त दौर ‘हरियाणा में आया राम-गया रामÓ के व्यंग्य वाक्य में परिभाषित हो, देशभर में चला गया. कई राज्यों में सरकारें उलट-पुलट हो गयीं. ऐसे ही दल बदल से त्रस्त होकर संसद ने दल बदल को रोकने का कानून बनाया. इसी दौर में राज्यपाल अपने तौर पर अलग-अलग तरीके अपना कर बहुमत फैसले करते रहे. उन पर केन्द्र की सत्तारुढ़ पार्टियां वे जिस पार्टी में कभी रहे थे- उसके दबाव में संविधान की जगह राजनैतिक पक्षपात के फैसले के आरोप लगे. ऐसे ही एक संदर्भ में कर्नाटक में राज्यपाल ने जनता पार्टी की मुख्यमंत्री बोम्मई सरकार को बर्खास्त कर दिया. उस पर सुप्रीम कोर्ट का जो निर्णय आया वह यह था कि राज्यपाल का बोम्मई सरकार को बर्खास्त करने का निर्णय गलत था. बहुमत का फैसला राजभवन नहीं बल्कि विधानसभा में होना चाहिए. लेकिन इस फैसले के आने के समय तक बोम्मई सरकार बर्खास्त की जा चुकी थी इसलिए वह बहाल न हो सकी लेकिन इस निर्णय से राज्यपाल की भूमिका गलत-सही के सिद्धांत पर सुप्रीम कोर्ट ने तय कर दी है.

अरुणाचल में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से एक उलझन नजर आ रही है कि राज्यपाल के सामने मुख्यमंत्री तुकी के बहुमत को चुनौती दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट के बोम्मई निर्णय से वह राजभवन में बहुमत के बारे में स्वयं निर्णय नहीं कर सकते हैं उसे विधानसभा में ही उन्हें जानना होगा और मुख्यमंत्री तुकी विधानसभा का सत्र फौरन दिसम्बर में न बुलाकर जनवरी तक खींच रहे थे. ऐसे में राज्यपाल ने उसे मुख्यमंत्री की सलाह के बिना या उसके विरुद्ध विधानसभा सत्र दिसम्बर में ही केवल ‘बहुमतÓ जांचने व जानने के लिये बुलाया. इसे चुनौती दी गयी और सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दे दिया कि वह मंत्री की अनुशंसा के बिना इसे नहीं बुला सकते. अब सवाल यह तो फिर अरुणाचल के राज्यपाल बिना विधानसभा बहुमत कैसे तय करे. सुप्रीम कोर्ट में यह निर्णय पहले से है कि राजभवन में याने राज्यपाल स्वयं बहुमत तय नहीं कर सकते. अरुणाचल में भी वैसी ही संविधान गुत्थी बनती दिख रही है जैसे कभी केशवानंद भारती के प्रकरण में उत्तरप्रदेश विधानसभा में बन
गयी थी.

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