इसे हम एक संयोग ही कह सकते हैं कि बापू के दक्षिण अफ्रीका से भारत आने के ठीक सौ साल बाद भोपाल में विश्व हिन्दी सम्मेलन होने जा रहा है. बापू सन् 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारतीय जन के अपमान का सीटक उत्तर देने की कल्पना से बंबई के बंदरगाह पर उतरे थे. यहां उनका भव्य स्वागत हुआ और देश में चल रहे स्वाधीनता आंदोलन को बल मिला. गुरु गोपालकृष्ण गोखले से मिलने के बाद, उनकी आज्ञा के अनुसार वे सालभर चुपचाप सभी गतिविधियों का जायजा लेते रहे- लोगों से मेल-मुलाकात करते रहे, उनके दु:ख दर्द को समझते रहे.
फरवरी सन्1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का शिलान्यास समारोह आयोजित हुआ. तत्कालीन वायसराय लार्ड हार्डिंग मुख्य अतिथि थे. देश के तमाम राजा महाराजे स्वर्णिम आभूषण पहने वहां उपस्थित थे. इस अवसर पर महामना मदन मोहन मालवीय ने गांधी को भी भाषण देने के लिये आमंत्रित किया था. गांधीजी उस वक्त तो वहां अंग्रेजी में ही बोले, क्षमा मांगते हुए, पर इस उद्बोधन में उन्होंने सबको इतनी खरी खरी स्पष्टï बातें कहीं कि लोग भयभीत हो गए. यह थी उनके तेजस्वी रूप की पहली झलक जिसमें उन्होंने साफ कह दिया कि यदि किसी दिन हमें स्वराज मिलेगा तो वह अपने ही पुरुषार्थ से मिलेगा- ब्रिटिश सरकार को इतना संकेत काफी था, गांधी को समझने के लिये. इस पूरे एक साल में मनन करके गांधी ने कुछ सूत्र तैयार किये थे, वे जीवमात्र की एकता चाहते थे- राष्ट्रीय एकता उसी का एक भाग थी. हिन्दू स्वराज लिखते समय 1909 में ही उनके मन में भारत की स्वाधीनता का ब्लूप्रिंट बन चुका था. उसी में पूरे देश के लिये एक भाषा का प्रश्न, जो संपर्क के लिये सबके काम आ सके उठा था- और उन्होंने हिन्दुस्तानी को इसके लिये सही माना था.

एक लक्ष्य, एक झंडा, एक भाषा, एक राष्टï्रीयता के लिये अनिवार्य है. यही था उनका मूल मंत्र. लखनऊ कांग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने गरज कर कहा कि एक वर्ष के अंदर आप हिन्दी नहीं सीख लेते तो आपको मेरा भाषण अंग्रेजी में सुनने को नहीं मिलेगा. वाइसराय ने जब युद्ध परिषद की बैठक बुलाई तो गांधीजी ने हिन्दी में ही अपना वक्तव्य दिया. अंग्रेज उन दिनों हिन्दी सीखने लगे थे. लार्ड डफरिन, लार्ड चेम्सफोर्ड हिन्दी में वार्तालाप करते थे. रानी विक्टोरिया ने भी हिन्दी सीखी थी. काशी हिन्दी विश्वविद्यालय में उन्होंने कहा कि गत दिवस में बंबई में हुए कांग्रेस अधिवेशन में तमाम श्रोता उन भाषणों से प्रभावित हुए, जो हिन्दी में हुए. काशी नगरी प्रचारिणी सभा में उन्होंने स्थापना की- जिस भाषा में तुलसीदास जैसे कवि ने कविता की हो वह अवश्य पवित्र है, उसके सामने कोई भाषा नहीं ठहर सकती.

हिन्दी की महत्ता और राष्टï्रभाषा के रूप में उसके अधिकार का वर्णन करते हुए बापू ने एक जगह कहा हिन्दी ही हिन्दुस्तान के शिक्षित समुदाय की भाषा हो सकती है. यह बात निर्विवाद सिद्ध है- केवल यही विचार करना है कि यह कैसे हो, जिस स्थान को आजकल अंग्रेजी भाषा लेने का प्रयास कर रही है- वो स्थान हिन्दी को मिलना चाहिए- बंगला, बिहारी, उडिय़ा, मराठी, गुजराती, राजस्थानी, पंजाबी और सिंधी हिन्दी के बहने हैं. उन भाषाओं के बोलने वाले थोड़ी बहुत हिन्दी समझ तथा बोल लेते हैं, इस सबको मिलाकर लगभग 22 करोड़ (उस समय) लोग हिन्दी बोल समझ सकते हैं, हमारी भीरुता, श्रद्धा और हिन्दी भाषा के गौरव के अज्ञान के कारण ही यह हमारी कामकाज की भाषा नहीं बन सकी है.

गांधीजी साफ साफ कहते थे कि मैं तो गुजरात से आया हूं, मेरी टूटी फूटी हिन्दी भी आप समझ लेते हैं, अत: आप भी हिन्दी को अपनाएं. लिपि की समस्या के संबंध में भी उन्होंने एक लिपि सम्मेलन में अपने सुझाव रखे थे. दक्षिण भारत के प्रदेशों में हिन्दी का प्रचार करने की उन्होंने 1918 में ही व्यवस्था कर दी थी, क्योंकि वे चाहते थे अहिन्दी भाषी प्रान्तों में भी हिन्दी का प्रचार हो और इसके लिये कार्यकर्ता चाहिए. हिन्दी के उत्साही साहसी, स्वाभिमानी, जोशीले पुरुषों को बिना मूल्य हिन्दी की शिक्षा देने के लिये दक्षिण के प्रांतों में भेजना चाहिए. शिक्षकों को भेजने के साथ स्वयं शिक्षण पुस्तकें भी बनानी चाहिए.

इलाशंकर गुहा

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